4rth post 9January2019… 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें :
मित्रों,
इस सम्बन्ध के कुछ उपलब्ध पत्र-प्रपत्रों का एक लम्बा पत्राचर जो 1985 से उत्तर प्रदेश की सरकारों के सांथ चला तथा अभी अपनी उत्तराखंडी सरकारों के सांथ भी लगातार चलता ही आ रहा है, इसे क्रम वार यहाँ देने का प्रयास किया जा रहा है जो इस पर्वतीय क्षेत्र के प्रति इनकी सम्बेद्नाओं को दर्शाते है… कृपया इस सम्बन्ध में अपने सुझाव भी साझा करें …
जैसा 3rd पोस्ट से विदित है कि “कास्तकार महिलाओं की योजना– “बीजू फल-पौधों को in-situ विधि से यथास्थान पर बिना उखाड़े उन्हें कलमी बनाया जाने, इन पौंधों की कीमत मय गड्डे-खाद-पानी एवं रख-रखाव आदि मेहनत के बदले उन्हें सब्जियां, दालें, मसाले, औषधीय पौंध आदि उपलब्ध कराई जाने हेतु उक्त योजना भूमि संरक्षण विभाग को सौंपी गई.
यद्यपि, इसे उद्यान विभाग द्वारा क्रियान्वित किया जाना चाहिए था जिन्होंने योजना की बारीकियों को समझा था. लेकिन, भूमि संरक्षण विभाग को भी योजना की सारी तकनीकियाँ समझाते हुए इस योजना को एक मॉडल के रूप में विकसित करने हेतु झलोड़ी ग्रामसभा की खिरखेत नामक स्थान से लगी सड़क किनारे की 17 हे० भूमि विधिवत कोर्ट स्टाम्प पर कास्तकारों के हस्ताक्षरों के सांथ इस आशय से दी गई की योजनान्तर्गत के सारे कार्य कास्तकार स्वयं करेंगे जिनके बदले में उन्हें योजना के दूसरे चरण की पैदावारों को जो मुख्य फलपौंधों के बीच की खाली भूमि में लेने हेतु आवश्यक सामंग्रियाँ (बीज,खाद,दवाइयाँ आदि) उपलब्ध कराई जायेंगी. इस सम्बन्ध की 28 पृष्ठों की एक विस्तृत पत्रावली क्षेत्रीय पटवारी द्वारा SDM रानीखेत को दी गई तथा तत्कालीन ब्लाक प्रमुख को भी योजनानुसार कार्य संपन्न कराए जाने हेतु पत्र दिया गया. (संलग्न- कोर्ट स्टाम्प पर भूमिधरों की सहमति आदि के सांथ पटवारी द्वारा SDM को तथा ब्लाकप्रमुख को वस्तुस्थियों से अवगत कराते पत्रादि 34 to 41 देखें). क्रमश: …
केवला नन्द “फ़कीर”
(Note- 1st 2nd तथा 3rd पोस्टों को भी दि० 19-11-2017, 5-12- 2017 तथा 19-12-2018 में देखें ताकि वस्तुस्थितियां स्पष्ट होती जाय)
3rd post 19 दिसम्बर 2018 बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से….इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें :
मित्रों,
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में कृषिभूमि की सही व्यवस्था (बंदोबस्ती-चकबंदी) न होने से भूमिधरों का पलायन ऐसा बढ़ा कि गाँवों में खेत बंजर, घर खंडर व बानर-सुवर-बाघों का आतंक तथा शिक्षा-स्वास्थचिकित्सा-व्यवसाय चरमराने से हजारों गाँव भूतिया हो चुके हैं… अत: पहाड़ विकास के लिए,
कृषिभूमि की चकबंदी तुरंत कराए सरकार नहीं तो न्यायालय के लिए हो जाओ तैयार…
जैसा 2nd पोस्ट के पत्रों से स्पष्ट है कि “कास्तकार महिलाओं की अपनी योजना” को जनपद अल्मोड़ा के ताडीखेत ब्लाक की अन्य ग्रामसभाओं में भी तुरंत लागू कराये जाने हेतु क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों व गणमान्यों का एक शिष्टमंडल दल तत्कालीन मा० पर्वतीय विकास मंत्री उ०प्र०, श्रीमान गोविन्द सिंह महरा जी के रानीखेत निवास पर 9-9-1989 को एक ज्ञापन के सांथ मिला. योजना जो महिलाओं की दिनचर्याओं पर आधारित थी, चर्चा के दौरान यह स्पष्ट हुवा कि भूमिधरों को उनके विखरे खेतों की कुल भूमि एक सांथ चकों में मिलते ही यह योजना बागवानी के क्षेत्र में अवश्य ही क्रांतिकारी परिवर्तन लाएगी जैसा कि निदेशक उद्यान ने भी अपने पत्र में कहा है. इस पर मा० मंत्री जी ने प्रशन्नता व्यक्त करते हुए आश्वासन दिया कि भूमिबंदोबस्ती-चकबंदी के लिए वे स्वयं लखनऊ से तुरंत कार्यवाही करायेंगे. (इस पर लखनऊ में 27-9-1989 को राजस्व परिषद तथा चकबंदी विभाग उ०प्र० की बैठक हुई जिसमें अल्मोड़ा व पौड़ी में चकबंदी के कार्यालय खोलने का निर्णय हुवा….. इस पर आगे चर्चा करेंगे).
माननीय के सांथ इस बैठक में यह भी तय हुवा कि “भूमिबंदोबस्ती-चकबंदी होने तक झलोड़ी गाँव में इस योजना का एक मॉडल सूखा राहत योजना Dry Proon Area Programe (DPAP) के तहत तैयार किया जाय”. जिसके लिए पुन: अध्यक्ष, ग्राम विकास परिषद, खिरखेत द्वारा निदेशक उद्यान को प्रार्थना की गई जिस पर उनके द्वारा जिलाधिकारी से आग्रह किया गया कि उक्त कार्य को DPAP के तहत संपादित कराया जाय.
तत्पश्चात स्थानीय उपायुक्त रानीखेत से प्रार्थना की गई जिसके चलते उन्होंने एक निचित दिन में अपने ही कार्यालय में जिलाधिकारी अल्मोड़ा के सांथ हमारी बैठक कराई जिसमें उन्होंने भी “कास्तकार महिलाओं की योजना” की बारीकियों को समझते हुए कि “फल-पौधों को in-situ विधि से यानि यथास्थान पर बीजू पौंधों को बिना उखाड़े उन्हें कलमी बनाया जायेगा, इन पौंधों की कीमत मय गड्डे-खाद-पानी एवं रख-रखाव आदि की मेहनत के बदले उन्हें सब्जियां, दालें, मसाले, औषधीय पौंध आदि उपलब्ध कराई जायेगी”, उक्त योजना को DPAP के तहत क्रियान्वयन हेतु भूमि संरक्षण विभाग को सौंपा. (संलग्न- अध्यक्ष परिषद, निदेशक उद्यान, SDM, DM को पत्रादि क्रमवार 26 to 33 देखें).
5 दिसम्बर’ 17 (योजना एवं धनराशि हेतु मा० मंत्रीजी को ज्ञापन) बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…. इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.
बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें :-
2nd पोस्ट 5-12-2017
मित्रों,
जैसा आपने इसके पहले 17 नवम्बर की 1st पोस्ट में देखा कि हमारी परम्परागत खेती में रवि फसलों की पैदावार लागत सन 1985 में 52/- रूपये प्रति किग्रा० की दर तक बैठने के कारण हमने निदेशालय उद्यान से प्रार्थना कि थी कि वे हमारी ग्रामसभा की पूरी भूमि को समन्वित बागवानी योजना के तहत चकों में विकसित कराएँ ताकि कास्तकारों को उनकी पैदावारों से आर्थिक लाभ मिले. जिसके लिए 26 जुलाय 1988 को भेजे गये हमारे पत्र के प्रतिउत्तर में निदेशालय उद्यान से DHO को एवं DHO से ADO को जो पत्र भेजे थे उनकी फोटो भी आपने देखी हैं.
लेकिन खेद है कि निदेशालय में अनेक तकनीकि विशेषज्ञों के होते हुए भी उन्होंने कष्टमय कृषि कार्य कर रही ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक उत्थान के लिए कोई भी ठोस योजना नहीं दी. अंतत: बाध्य होकर भूमिधरों ने “ग्राम विकास परिषद्” नाम कि अपनी पंजीकृत संस्था के माध्यम से खुद योजना बनाई जिसे,
1a-d– ग्रामसभा की पूरी भूमि के लिए समन्वित बागवानी हेतु 2070210/- (बीस लाख सत्तर हजार दो सौ दस रुपयों) की 14 प्रष्ठों की एक योजना दि० 8 फरवरी 1989 में निदेशालय को सौंपी. जिसमें 1a से 1d तक मुख्य योजना व मोवाइल यूनिट का डिटेल मात्र यहाँ पर दिया जा रहा है. आवश्यक होने पर अन्यों का डिटेल भी दिया जाएगा.
2a-b– इसके क्रम में 8 फरवरी 89 को ही निदेशालय उद्यान द्वारा सहायक आयुक्त एवं संबंधितों को पत्र भेजे गए.
3- पुन: निदेशालय उद्यान के पत्र के क्रम में DHO अल्मोड़ा ने अपने पत्र दि० 6 अप्रेल 89 के द्वारा अध्यक्ष परिषद, मुझे एवं अन्यों को सलाह दी कि हम उक्त योजना के लिए किसी व्यवसायिक बैंक से लोन ले लें.
4a-b– इस पर 28 अप्रेल 89 के पत्र द्वारा स्पष्ट किया गया कि लोन लेकर भूमिधरों/कास्तकारों को दोहरी समस्याओं में उल्झाने के बजाय पर्वतीय क्षेत्र के विकास हेतु सरकारों द्वारा चलाई जा रही नाना प्रकार की योजनाओं के अंतर्गत किसी एक योजना के तहत इस क्षेत्र को भी उक्त योजनाबद्ध तरीकों से विकसित किया जाय.
5a-b– अध्यक्ष ग्राम विकास परिषद् द्वारा दि० 18 जून 89 को मा० मुख्य मन्त्री उत्तरप्रदेश को भी पत्र दिया गया कि राज्य अथवा केंद्र सरकार की ओर से इस योजना के लिए बजट दिलाया जाय.
6a-b– इधर क्षेत्रीय ग्रामप्रधानों, जनप्रतिनिधियों, गणमान्यों आदि ने भी उक्त योजनानुसार क्षेत्र की अन्य 15 ग्रामसभाओं में भी इस योजना को तुरंत लागू कराने हेतु तत्कालीन वरिष्ट उपाध्यक्ष, पर्वतीय विकास परिषद, उत्तरप्रदेश, श्रीमान गोविन्द सिंह महरा जी, कैम्प रानीखेत को भी 9 सितम्बर 89 को एक ज्ञापन दिया.
7a-d– इसके तुरंत बाद 5 दिसम्बर 89 को परिषद की बैठक में ग्रामसभा के प्रत्येक गाँव के लिए महिला मंडल कि अध्यक्षाओं का मनोनयन कर उनके द्वारा 14 दिसम्बर के पत्र से SDM रानीखेत को संबोधित करते हुए अध्यक्ष पर्वतीय विकास परिषद उ०प्र० एवं अन्य संबंधितों को भी आग्रह किया गया कि क्षेत्र को फल-पट्टी के रूप में विकसित किया जाय. कृपया इन सभी पत्रों की फोटो भी देखें. सम्बंधितों की प्रतिक्रियायें अगली पोस्ट पर….. धन्यवाद.
उत्तराखंड का पर्वतीय क्षेत्र मानवता के लिए एक बरदान है जिसे मैंने उत्तराखंड से बाहर रह कर समझा. 1974 में देश के पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश के कृषि-उद्यान विभाग में नियुक्त हुवा. विभाग के आदेशोंनुसार वहां के लिए फल- पौंधे तथा नर्सरियों के लिए माली, बागवानों के लिए मधुमक्खियों के बक्से आदि आदि हेतु उद्यान निदेशालय चौबटिया, रानीखेत मेरा आना जाना लगातार चलता रहा. इसबीच, यहाँ के फल-पौधों से अरुणाचल के किसानों की दिन प्रति दिन सुधरती आर्थिक स्थितियों के मुकाबले हमारे पहाड़ के किसान 52/- रूपये प्रति किग्रा० की दर तक बैठने वाली कृषि फसलों को ही लेने को मजबूर हैं…? यद्यपि, जागरूक किसानों का एक समूह सितोष्ण पौधशालाओं के लिए सक्रिय था किन्तु इसकी भी 1984 में सेव में स्कैव नामक की बिमारी ने कमर ही तोड़ दी…? ऐसी बिडम्बनाओं को देखकर पहाड़ के किसानों के बिखरे खेतों को पहले चकबंदी की प्रक्रिया के द्वारा इकट्ठा कराने की सोच बनी. यों भी चकबंदी देश के विभन्न राज्यों में 1920 से लागू है तथा हमारे पडौसी राज्य हिमाचल प्रदेश ने भी 1971 में पंजाब से पृथक राज्य मिलते ही इस चकबंदी की प्रक्रिया को पहले अपनाया. इसी प्रक्रिया के द्वारा यहाँ, पहाड़ के किसानों के बिखरे खेतों को भी इकट्ठा कराने की जो कोशीस की गई वह आज 40 वर्षों बाद भी जारी है. यद्यपि मा० हाईकोर्ट से संबंधितों को नोटिस जाते ही सरकार ने 2020-21 से चकबंदी कराने के आदेश दे दिए हैं तथा हमारी जनहित याचिका के क्रम में सरकार की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में भी यह स्वीकारा है कि रानीखेत के झलोड़ी गाँव के स्वैच्छिक चकबंदी के प्रस्ताव को बोर्ड आफ रेवन्यू भेज दिया गया था किन्तु इसके बाद भी इन बीते वर्षों में आगे कोई कार्यवाही नहीं होना चकबंदी की प्रक्रिया में आने वाले अवरोध प्राकृतिक कम साजिशों से भरे ज्यादा होने से शासन-प्रशासन एवं अन्यों की मंशा पर भी प्रश्न चिन्ह लगाते हैं? इस सम्बन्ध के कुछ मुख्य पत्र-तथ्य जो मेरे अरुणाचल प्रवास के दौरान हुवे उन्हें फेसबुक पर क्रमवार 14 पोस्टों में दिया गया है. इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें. केवला नन्द तेवाड़ी
चकबंदी मंच उत्तराखंड
मित्रो, दैनिक जागरण 16 नम्बर, 2017 का समाचार शीर्षक “ कुमाऊं का चकबंदी गाँव बनेगा झलोड़ी ” उसमें 1985 से चले आ रहे प्रयासों का जिक्र किया गया है जिससे तबकि फाइलों के पन्नों को देखने से लगता है कि “उत्तराखंड में चकबंदी आवश्यक क्यों?” यह कल-परसों की कोई अचानक उपजी सोच नहीं है. इस बारे में जल-जंगल जमीनों से जुड़े पौड़ी निवासी 81 वर्ष के बयोब्रद्ध आ० गणेश गरीब जी जैसे अनेक व्यक्तियों का मानना है कि देश के अन्य पहाड़ी राज्यों की तरह सरकारों ने हमारे पूर्वजों के विखरे खेतों की कुल भूमि जिसकी जितनी है उतनी एक सांथ चकों में अगर तभी दे दी होती तो निश्चय ही भूमिधर एक ही स्थान पर पूर्ण मनोयोग से कृषिजन्य कार्यों को अपनी
आर्थिकी का मुख्य श्रोत बनाकर अन्य बाहरी श्रोतों से होने वाली आय जैसे नौकरी-पेसा व सरकारी अनुदान आदि से गाँवों को औद्योगिकरण की ओर लेजाते जिससे आज के यही गाँव शहरों में परिवर्तित हो रहे होते. जबकि विकास के नाम पर सरकारी स्तरों से जो भी प्रयास हुए वे सब सोने के अन्डे देने वाली मुर्गी का हलाल करके रातों रात मालामाल होने की होड़ में इस देव भूमि की आत्मा माने जाने वाले समृद्ध गाँवों को ही ऐसा लील गया कि आज हमारे हजारों गाँव भूतिया गाँवों में तब्दील हो चुके हैं और हम खुद जमीन जायदाद वाले होकर भी खाना-बदोसों का जैसा जीवन जीने को मजबूर हैं. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी आज इसकी पुष्टि करता है. मित्रों, इस सम्बन्ध में ऐसा नहीं कि हम तब चुप थे, मेरा इन बीते 43 वर्षों (1974-2017) का व्यक्तिगत अनुभव आधारित कुछ पत्राचार जो पुरानी फाइलों में पड़ा है, उसे यहाँ संक्षिप्त में देखिये कि :-
मैं 1974 में अरुणाचल प्रदेश (तब लोग उसे नेफा के नाम से जानते थे) के कृषि-उद्यान विभाग में नियुक्त हुवा. वहां की आबो-हवा व भौगोलिक परिस्थितियां हमारे उत्तराखंड जैसी ही होने के कारण वहाँ बागवानी विकास हेतु यहाँ चौबटिया, रानीखेत तथा हिमाचल व जम्मू-कश्मीर से प्रति वर्ष लाखों फल-पौंधों को लेजाकर वहां की हजारों हेक्टर भूमि में नाना प्रकार के फलों की पट्टियाँ तथा अनेकों पौधशालायें तैयार की गयी. वहां पर आज ठन्डे इलाकों में सेव व अखरोट ने अच्छी पकड़ बना ली है तथा कीवी फल की पैदावार विदेशी आयात को टक्कर देने की स्थिति में आ रही है. निचले इलाकों में संतरा, अन्नानास ने अच्छी पकड़ बनाई है तथा बड़ी इलायची 600/- 700/- रु० किलो के हिसाब से व्यापारी खेतों से पैदावार उठाकर सीधे अरब की बाजारों में निर्यात कर रहे हैं. इसे अगर ठीक से समझा जाय तो 2014 तक, अकेले बागवानी से 25-30 से 60-70 लाख रु० तक प्रतिवर्ष की आय लेने वाले अनेक किसान अरुणाचल में मौजूद हैं. बड़ी इलायची को बढ़ावा देने में सिक्किम राज्य का काफी योगदान है. कुल मिलाकर बागवानी विकास उस क्षेत्र में आम जन-समुदाय की आर्थिकी का केंद्र बनता जा रहा है.
जबकि यहाँ हमारे उत्तराखंड में भारत की आजादी (1947) के तुरंत बाद से ही उ०प्र० के इस पर्वतीय क्षेत्र (उत्तराखण्ड) की आबो- हवा में बागवानी विकास की अपार सम्भावनाओं को ध्यान में रख कर उद्यान एवं फल संस्करण के सांथ-सांथ अनुसंधान हेतु भी चौबटिया (रानीखेत) में निदेशालय उद्यान की स्थापना की गई थी. लेकिन यह आश्चर्य ही है कि चकबंदी के अभाव में हमारे कास्तकार अपने दूर-दूर विखरे खेतों में हल-बैल लेकर जुताई, बुवाई, देख-रेख हेतु आने-जाने में समय, श्रम व मजदूरी देकर 1985 में भी 52/- रूपये प्रति किग्रा० की दर तक बैठने वाली परम्परागत कृषि पैदावारें ही लेने को बाध्य थे. जो आज की परिस्थितियों में सैकड़ों रूपये प्रति किग्रा० हो गयी होंगी. हमने इन आकड़ों के आधार पर तभी 1985 में उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप व्यवसायिक सहकारी कृषि-बागवानी को चकबंदी के तौर पर देश के अन्य पहाड़ी राज्यों की भाँती तत्कालीन उत्तर प्रदेश के इस पर्वतीय क्षेत्र में भी अपनाने की पुरजोर पहल की जो आज 2017 में भी जारी है. इस सम्बन्ध में 1985 से ही निदेशालय उद्यान एवं संबंधितों को मेरे द्वारा अरुणाचल प्रदेश से लिखे गए पत्रों में से कुछों को सिलसिलेवार यहाँ दिया जा रहा है जिनमें दि० 26 जुलाय 1988 के पत्र के प्रतिउत्तर में निदेशालय उद्यान से DHO को एवं DHO से ADO को पत्रों की फोटो भी देखें. सम्बंधितों की प्रतिक्रियायें अगली पोस्ट पर….. धन्यवाद. केवल नन्द “फकीर” 7351026532
जैसा पूर्व ब्लॉग से ज्ञात है कि “उत्तराखंड पर्वतीय क्षेत्र जोत चकबंदी एवं भूमि व्यवस्था विधेयक 2016” पास होने के बाद स्वैच्छिक चकबंदी हेतु वर्षों से तैयार अनेक गांवों में शासनादेशों के तहत सम्बन्धित अधिकारियों के भ्रमण/निरिक्षण होने के बाबजूद भी मूलनिवासियों की बिखरी कृषिभूमि की चकबंदी नहीं कराके 2018 में पूंजीपतियों के लिए नया भू क़ानून पास कर दिया गया… इसे देखकर मा० हाईकोर्ट की सरण जाने के अलावा हमारे पास और कोई भी विकल्प नही होने से जब अपने पहाड़ी वकीलों से सम्पर्क किया तो उन्होंने भी हाँ हाँ तो कहा किन्तु इसे मा० हाईकोर्ट में दायर नहीं किया जा सका तो मा० सुप्रीमकोर्ट में कार्यरत उन बाहरी राज्यों के वकीलों से सम्पर्क किया गया जहां चकबंदी हुई है. इसी बीच जब उन वकीलों के द्वारा 2020 में जनहित याचिका तैयार होने लगी तो मा० न्यायालय की फटकार से बचने के लिए सरकार ने आनन फानन में 2016 से पास वो चकबंदी विधेयक/एक्ट जिसे Blog-2 में दिया गया है, को लागू कराके “ उत्तराखंड पर्वतीय क्षेत्र जोत चकबंदी एवं भूमि व्यवस्था नियमावली 2020 “ भी कैविनेट से पास कर दी तथा पहाड़ में चकबंदी का कार्य करने के लिए राजस्व विभाग को ही दायित्व दे दिया गया है.
लेकिन फिर भी किसी भी गाँव में धरातल पर जब कार्य नहीं हुवा तो अंतत: नवम्बर 2020 में सुप्रीमकोर्ट के वकीलों द्वारा तैयार उक्त जनहित याचिका 2 जनप्रतिनिधियों (विधायक रानीखेत तथा कृषि-उद्यान मंत्री उत्तराखंड) तथा 6 अधिकारियों (मुख्य सचिव उख०, राजस्व सचिव उख०, जिलाधिकारी अल्मोड़ा, मुख्य विकास अधिकारी अल्मोड़ा, उप जिलाधिकारी रानीखेत एवं तहसीलदार रानीखेत) को नामित करते हुए मा० हाईकोर्ट नैनीताल में दायर होते ही संबंधितों को नोटिस जारी हुए जिन्हें तत्कालीन समाचारोंयुक्त इन links
23-12-20 Times of India… Agri minister & Ranikhet MLA sent notices over ‘non-implementation’ of Uttarakhand Hills Consolidation of Holdings and Land Reforms Act
27-12-20 नैनीताल माननीय उच्च न्यायालय ने 3 सप्ताह मे राज्य सरकार, कृषि मंत्री, कृषि सचिव, एंव रानीखेत विधायक से पर्वतीय इलाको मे बिखरी खेती पर चकबन्दी लागू कराने हेतु जबाव माँगा है लेकिन संबंधितों को उपरोक्त नोटिस जारी होने के उपरांत 2021 में सरकार की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में यह स्वीकारने के बाद भी कि रानीखेत के झलोड़ी गाँव के स्वैच्छिक चकबंदी के प्रस्ताव को बोर्ड आफ रेवन्यू भेज दिया गया था किन्तु इसके बाद इन बीते वर्षों में भी आगे कोई कार्यवाही नहीं हुई… link पर देखें. तथा जिलाधिकारी अल्मोड़ा की ओर से सभी उप जिलाधारियों को शासनादेश भी निर्गत हुवे हैं कि उक्त चकबंदी नियमावली 2020 में उल्लिखित नियमों/प्रावधानों के अंतर्गत गाँवों में चकबंदी की कार्यवाही करना सुनिश्चित करें. इस शासनादेश की फोटो भी देखें जिसे जानबूझकर अस्पष्ट ही प्रेषित किया गया है ताकि कहने को हो गया कि हमने तो शासनादेश भी जारी कर दिए थे.
लेकिन शासन-प्रशासन चकबंदी के लिए अब हमारे सहखातेदारों का बिरोध दिखाकर तथा मामला न्यायालय में विचाराधीन है कहकर चकबंदी को रोक रहा है जबकि इन्हीं खेतों को बेचते वक्त किसी भी सहखातेदार का हक़ दिखाकर चुपके छुपके बिकवा देने का ये दोहरा चरित्र क्यों? धोखे से बेचे गये खेतों के मालिक अब न्यायालयों के चक्कर लगाने को भी मजबूर हैं Link
इसलिए अब ग्रामीणों द्वारा निर्णय लिए जा रहे हैं कि वे आपसी सहमति से अपने खेतों को परस्पर अदल बदलकर खुद ही अपने अपने चक बनाये तथा इन चकों के अंदर आ रहे खेतों को पुराने गोलखातों से निकालकर आगे के लिए चकस्वामी के व्यक्तिगत नाम पर कराए जाने हेतु अपनी तहसीलों को आवेदन करें ताकि खेत व्यक्तिगत नाम पर होने से फिर इन्हें बिना लिखित अनुमति के कोई दूसरा बेचने नहीं सकेगा.
ज्ञात हों, चकबंदी एक्ट के नियमों/प्रावधानों के अंतर्गत कास्तकारों के बिखरे खेतों को इकट्ठा चकों में कराने की भूमिधरों को कोई रजिस्ट्री फीस नहीं देनी होती, यह सुविधा निशुल्क दी जाती है. जबकि सामान्य प्रक्रिया के तहत खेतों को खरीदकर इकट्ठा चकों में करने हेतु प्रतिनाली कम से कम 20000/- (बीस हजार) रूपये रजिस्ट्री फ़ीस देनी होती है. यदि खेत सड़क, स्कूल, स्वास्थ केंद्र आदि की सुविधायुक्त स्थान पर अथवा इसके नजदीक हो तो रजिस्ट्री फ़ीस/सर्कल रेट भी उसीनुसार और भी ज्यादा होते हैं.