हमारी चुनी हुई सरकारें भावी पीढ़ियों को कहाँ पहुंचाएंगी.

हमारी चुनी हुई सरकारें भावी पीढ़ियों को कहाँ पहुंचाएंगी.

9th पोस्ट (पार्ट- I) ….1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…….. (गतांक 19-2-2019 की 8th पोस्ट से आगे)….इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें

मित्रों,

उत्तरखंड पर्वतीय क्षेत्र के ग्रामीण भूमिधरों को उनके पूर्वजों के विखरे खेतों की कुल भूमि अन्य पर्वतीय राज्यों की भाँती मूलभूत सुविधाओं के सांथ चकों में मिलनी चाहिए. इससे बंदरों, सुवरों आदि से फसलों की सुरक्षा आसान होने पर दीर्घकालीन रोजगारपरक व्यवसायिक खेती के आर्थिक लाभों को देख कर गाँवों से पलायन कर चुके लोग स्वत: वापस आने के लिए प्रेरित होंगे जिससे गाँवों में आवादी बढने पर शिक्षा, स्वास्थचिकित्सा, व्यवसाय, जल-जंगल-जमीन, गैर उत्तराखंडियों की घुस-पैठ, गैरसैण राजधानी जैसे अनेक मुद्दों में जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी भी स्वत: सुनिश्चित होगी !!!

लेकिन सरकार भूमिबंदोबस्ती-चकबंदी के इस अहम मुद्दे को 1985 से किसी ना किसी बहाने टालते आई है… इस सम्बन्ध का एक लम्बा पत्राचार 1985 से 2014 तक जो अरुणाचल प्रदेश प्रवास के दौरान चला, उसे इससे पहले की 8 पोस्टों में क्रमवार दिया गया है. इधर 2014 के बाद का पत्राचार भी आप सभी पहाड़ प्रेमी एवं चकबंदी शुभचिंतकों की जानकारी के लिए आगे की पोस्टों में भी क्रमवार दिया जाना है ताकि भूमि सम्बन्धी मुहिम मजबूत बन कर हमारी भावी पीढियों/बाल-बच्चों को उनके पूर्वजों के जल-जंगल-जमीनों आदि की सही जानकारी होकर खाते-खतौनियों में उनके विखरे खेतों की कृषिभूमि चकों में व्यवस्थित हो, जो भविष्य के लिए उनका एक स्थायी पता भी होगा !!! वर्ना, हम जमीन-जायदाद वालों को 1985 से चिल्लाने के बाद भी, जब वर्तमान में ही, स्लम्स में बंजारों का जैसा जीवन जीने को मजबूर किया जाने लगा है, तो कल्पना करके देखिये कि डिमोक्रेसी के नाम पर चुनी जा रही ये सरकारें हमारी भावी पीढ़ियों को कहाँ पहुंचाएंगी ??? (स्लम्स में रहते हैं पलायन करने वाले अधिकतर उत्तराखंडी… समाचार की कटिंग पृष्ट 184 भी देखें).

इसीलिए, हमारा स्पष्ट मानना है कि भूमिधरों की कुल भूमि जब तक उन्हें मूलभूत सुविधाओं के सांथ चकों में नहीं मिलेंगी तो बंदरों, सुवरों व बाघों का आतंक में कोई भी परिवार विखरे खेतों में कैसे खेती करेगा तथा किसके सहारे गांवों में रहेगा? पलायन का यही मुख्य कारण हैं; जिससे खेत बंजर, घर खंडर तथा हजारों गाँव भूतिया हो कर पहाड़ में शिक्षा-स्वास्थ-व्यवसाय आदि भी बर्बाद है… तो फिर ये तथाकथित जनप्रतिनिधियों की सरकार पलायन रोकने के नाम पर करोड़ों-अरबों की योजनायें व कमेटियाँ, समीतियाँ तथा आयोग के बजट को एक बार अपने ही भूमिधर वोटरों की पुस्तैनी भूमि को व्यवस्थित करने के लिए भी क्यों खर्च नहीं करना चाहते…???

अत: जो-जो गाँव चकबंदी के लिए तैयार हैं उनमें सरकार भूमिबंदोबस्ती-चकबंदी भू-प्रबंधन के सांथ मॉडल के तौर पर तुरंत कराए.कृपया, 2014 से 2016 तक का एक लम्बा पत्राचार जिसे संशिप्त रूप में 64 पृष्ठों के द्वारा वर्तमान सरकार के अस्तित्व में आते ही मार्च 2017 में मा० मुख्यमंत्री जी को दिया गया है. स्थानाभाव के कारण इस पोस्ट में मात्र 42 पत्रों को 120 to 161 में देखें तथा बांकी 22 पत्रों को 162 to 184 में इसी 9th पोस्ट के पार्ट-II में देखें :- क्रमश:

केवला नन्द “फ़कीर”

जनपद अल्मोड़ा एवं पौड़ी में चकबंदी कार्यालय हेतु शासनादेश

जनपद अल्मोड़ा एवं पौड़ी में चकबंदी कार्यालय हेतु शासनादेश

8th पोस्ट… 18 फ़रवरी 2019……1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से….इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें

मित्रों,

अरुणाचल प्रदेश में 1975 से 2014 तक नौकरी करते हुए अपने घर-गाँव व पहाड़ के ग्रामीण परिवेश में उपलब्ध संसाधनों के उचित संवर्धन एवं दोहन से विश्व प्रशिद्ध देवभूमि उत्तराखंड को और भी गौरवशाली बनाने में भूमिधरों की कृषिजन्य पारम्परिक दैनिक कार्यकुशालाताओं को उनके विखरे खेतों की भूमिबंदोबस्ती एवं चकबंदी (भूमि व्यवस्थित) कराकर जो नितांत आवश्यक है, ऐसा समझकर संबंधितों के सांथ जो भी पत्राचार संभव हुवा, आप सभी पाठकों के सम्मुख 7 पोस्टों में संक्षिप्त रूप से प्रस्तुत करते हुए मुझे हर्ष है कि आप लोगों ने इन्हें गैर से पढ़ कर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं भी दी हैं जो देर-सबेर एक दिन इन सब के लिए जुम्मेदार लोगों को सोचने पर मजबूर करेंगे.

उधर जैसा 3rd पोस्ट (19-12-2018) में बताया गया है कि ग्रामसभा झलोड़ी (रानीखेत) की 200 हे० भूमि को महिलाओं की योजनानुसार चकबंदी के द्वारा विकसित कराने के लिए अध्यक्ष राजस्व परिषद उत्तर प्रदेश, लखनऊ की 27-9-1989 की बैठक के निर्णयोंनुसार पत्र दि० 7-6-1990 के क्रम में जनपद अल्मोड़ा एवं पौड़ी में 1991 से चकबंदी कार्यालय भी खोले गये थे !!! लखनऊ के पत्रों की फोटो देखें.

चकबंदी कार्यालय खुलते ही इन जनपदों के भूमिधर ने अपने आवाद खेतों में खेती करना भी इस आशा से छोड़ दिया कि उनकी कुल जमीन अब एक सांथ चकों में मिलेगी !!! लेकिन 7-8 वर्षों बाद पता चला कि उप्र० चकबंदी एक्ट 1953 यहाँ की पर्वतीय भौगोलिक स्थितियों के लिए सही नहीं है, अत: पर्वतीय क्षेत्र के लिए अलग एक्ट होने पर ही यहाँ चकबंदी होगी कह कर उन कार्यालयों को बंद करा दिया गया… जो भूमिधरों का दुर्भाग्य रहा !!! नतीजा, इन दोनों जनपदों के ग्रामीण भूमिधर अन्य जनपदों के मुकाबले पूरे बर्बाद हुए जिससे यहाँ पलायन भी अधिक हुवा है? इस पर हम आगे चर्चा करेंगे…

इधर, 2000 में प्रथक राज्य बनते ही “ पर्वतीय क्षेत्र चकबंदी एक्ट “ के लिए हर सरकार ने अपनी-अपनी कमेटियाँ/समीतियाँ बना-बना कर नाना प्रकार के आश्वासन व घोषणाएं कर-कर के अपने ही भूमिधर वोटरों को इस भ्रम में भी रखते रहे कि मानो अब चकबंदी होने ही वाली है… और अपना-अपना पांच-पांच वर्षों का कार्यकाल बारी-बारी निकालते रहे…

उपरोक्त पत्रों के सांथ “पहाड़ों की उपयोगिता बागवानी-चकबंदी भाग- I तथा II ” भी संलग्न- पत्र संख्या 99 to 119 में देखें. क्रमश:

केवला नन्द “फकीर”

विभागों की मनमानी व न्यायिक जांच के आदेश

विभागों की मनमानी व न्यायिक जांच के आदेश

5th post…14 जनवरी’ 2019  (विभागों की मनमानी व न्यायिक जांच के आदेश) 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें :

मित्रों,

इस सम्बन्ध के कुछ उपलब्ध पत्र-प्रपत्रों का एक लम्बा पत्राचर जो मेरे अरुणाचल प्रदेश में सेवारत रहते हुए 1985 से उत्तर प्रदेश की सरकारों के सांथ चला तथा अभी सेवानिवृत होने के बाद अपनी उत्तराखंड की सरकारों के सांथ भी लगातार चलता ही आ रहा है, इसे क्रम वार यहाँ देने का प्रयास किया जा रहा है जो इस पर्वतीय क्षेत्र के प्रति जुम्मेदार सरकारों की सम्बेद्नाओं को दर्शाते है… कृपया इस सम्बन्ध के यदि किसी अन्य के पास भी कोई पत्रादि हों तो उन्हें भी साझा करें तथा सभी शुभचिंतकों से भी आग्रह है कि वे भी अपने सुझाव दें ताकि सरकारों की गलत नीतियों के कारण भूमिधरों को मालिक से मजबूरी में मजदूर होने से रोकने के लिए न्यायालय में पहल की जा सके.

जैसा 4th पोस्ट से विदित है कि “कास्तकार महिलाओं की योजना” को क्रियान्वयन हेतु 17 हेक्टर यानि 850 नाली भूमि का एक टुकडा भूमि संरक्षण विभाग को दिया गया किन्तु देखते ही देखते योजना के नाम पर रुपयों को ठिकाने लगाने की मुहिम ऐसी तेज हुई कि कास्तकारों की भूमि दूर-दूर छोटे-छोटे टुकड़ों में विखरी होने के कारण अधिकारियों व कर्मचारियों ने मनमानी करके उक्त योजना की ऐसे-तैसी कर दी.

कास्तकारों की परिषद् एवं खेती का कार्य कर रही महिला मंडलों के साथ विचार-विमर्श किये बगैर ही, जैसा कि योजनानुसार सीटू विधि से स्वयं की बीजू पौंध उचित दूरी पर विधिवत तैयार गड्डों में उगाकर उन्हें बिना उखाड़े वहीं पर कलमी बनाकर पालने की कीमत कास्तकारों को ही दी जानी थी, ताकि वे योजना के दूसरे चरण पर काम करते लेकिन अधिकारियों ने योजना के विपरीत आपा-धापी में मैदानी क्षेत्रों की नर्सरियों से आम, नीबूं, अमरूद आदि की हजारों बीजू पौंधों को लाकर नैपाली मजदूरों द्वारा वहां की बलुई-दोमट मिटटी में बिना सिचाई व्यवस्था के जहां-तहां रोपण करा कर धनराशि का दुरूपयोग किया जाने लगा.

दूसरी ओर, कास्तकारों की 25-30 वर्ष पुरानी सींचाई व्यवस्था जो गर्मियों में गधेरे की पानी की क्षमतानुसार पतली गूल से हो रही थी उसकी थोड़ी-बहुत मरम्मत के बजाय उसे जड़ से ही उखाड़ कर, कास्तकारों के मना करने के बाबजूद भी, रुपयों को खपाने के लिए जबरदस्ती नहर रुपी नयी गूल का निर्माण करा दिया. इससे बरसात के भयंकर पानी से कास्तकारों के अनेक सीढ़ीदार खेत बह गये. खेतों में जहाँ-तहां कटाव व भूस्खलन से अनेक अप्रत्यासित नुकसान होगये. (पटवारी की रिपोर्ट देखें). इनसे कास्तकार महिलाओं की भावनाओं को बहुत बड़ी ठेस पहुंची क्योंकि वे ही इस योजना की मुख्य सूत्रधार थी और सरकार से बहुत बड़ी आशा लगाये हुए थी !!!

लेकिन, इसे देख कास्तकारों का रोष जब न्यायालय की शरण लेने को बाध्य होने लगा तो शासन द्वारा कार्य को बंद कराते हुए उक्त भूमि संरक्षण विभाग को पूरे पर्वतीय क्षेत्र में बैन कर दिया गया. इस प्रकरण का एक लम्बा पत्राचार मौजूद है जिसके कुछ ही पत्रों को यहाँ पर दिया जा रहा है. (भूमि संरक्षण विभाग की मनमानी, SDM, DM आदि को पत्र, समाचारों की कटिंग्स व न्यायिक जांच हेतु प्रार्थना आदि क्रमवार संलग्न- 42 to 73 देखें). क्रमश: …

केवला नन्द “फकीर”

17 हे० की बागवानी के लिए कोर्टस्टाम्प पर सहमति

17 हे० की बागवानी के लिए कोर्टस्टाम्प पर सहमति

4rth post 9January2019… 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें :

मित्रों,

इस सम्बन्ध के कुछ उपलब्ध पत्र-प्रपत्रों का एक लम्बा पत्राचर जो 1985 से उत्तर प्रदेश की सरकारों के सांथ चला तथा अभी अपनी उत्तराखंडी सरकारों के सांथ भी लगातार चलता ही आ रहा है, इसे क्रम वार यहाँ देने का प्रयास किया जा रहा है जो इस पर्वतीय क्षेत्र के प्रति इनकी सम्बेद्नाओं को दर्शाते है… कृपया इस सम्बन्ध में अपने सुझाव भी साझा करें …

जैसा 3rd पोस्ट से विदित है कि “कास्तकार महिलाओं की योजना– “बीजू फल-पौधों को in-situ विधि से यथास्थान पर बिना उखाड़े उन्हें कलमी बनाया जाने, इन पौंधों की कीमत मय गड्डे-खाद-पानी एवं रख-रखाव आदि मेहनत के बदले उन्हें सब्जियां, दालें, मसाले, औषधीय पौंध आदि उपलब्ध कराई जाने हेतु उक्त योजना भूमि संरक्षण विभाग को सौंपी गई.

यद्यपि, इसे उद्यान विभाग द्वारा क्रियान्वित किया जाना चाहिए था जिन्होंने योजना की बारीकियों को समझा था. लेकिन, भूमि संरक्षण विभाग को भी योजना की सारी तकनीकियाँ समझाते हुए इस योजना को एक मॉडल के रूप में विकसित करने हेतु झलोड़ी ग्रामसभा की खिरखेत नामक स्थान से लगी सड़क किनारे की 17 हे० भूमि विधिवत कोर्ट स्टाम्प पर कास्तकारों के हस्ताक्षरों के सांथ इस आशय से दी गई की योजनान्तर्गत के सारे कार्य कास्तकार स्वयं करेंगे जिनके बदले में उन्हें योजना के दूसरे चरण की पैदावारों को जो मुख्य फलपौंधों के बीच की खाली भूमि में लेने हेतु आवश्यक सामंग्रियाँ (बीज,खाद,दवाइयाँ आदि) उपलब्ध कराई जायेंगी. इस सम्बन्ध की 28 पृष्ठों की एक विस्तृत पत्रावली क्षेत्रीय पटवारी द्वारा SDM रानीखेत को दी गई तथा तत्कालीन ब्लाक प्रमुख को भी योजनानुसार कार्य संपन्न कराए जाने हेतु पत्र दिया गया. (संलग्न- कोर्ट स्टाम्प पर भूमिधरों की सहमति आदि के सांथ पटवारी द्वारा SDM को तथा ब्लाकप्रमुख को वस्तुस्थियों से अवगत कराते पत्रादि 34 to 41 देखें). क्रमश: …

केवला नन्द “फ़कीर”

(Note- 1st 2nd तथा 3rd पोस्टों को भी दि० 19-11-2017, 5-12- 2017 तथा 19-12-2018 में देखें ताकि वस्तुस्थितियां स्पष्ट होती जाय)

अल्मोड़ा व पौड़ी में चकबंदी के आदेश

अल्मोड़ा व पौड़ी में चकबंदी के आदेश

3rd post 19 दिसम्बर 2018 बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से….इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें :

मित्रों,

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में कृषिभूमि की सही व्यवस्था (बंदोबस्ती-चकबंदी) न होने से भूमिधरों का पलायन ऐसा बढ़ा कि गाँवों में खेत बंजर, घर खंडर व बानर-सुवर-बाघों का आतंक तथा शिक्षा-स्वास्थचिकित्सा-व्यवसाय चरमराने से हजारों गाँव भूतिया हो चुके हैं… अत: पहाड़ विकास के लिए,

कृषिभूमि की चकबंदी तुरंत कराए सरकार नहीं तो न्यायालय के लिए हो जाओ तैयार…

जैसा 2nd पोस्ट के पत्रों से स्पष्ट है कि “कास्तकार महिलाओं की अपनी योजना” को जनपद अल्मोड़ा के ताडीखेत ब्लाक की अन्य ग्रामसभाओं में भी तुरंत लागू कराये जाने हेतु क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों व गणमान्यों का एक शिष्टमंडल दल तत्कालीन मा० पर्वतीय विकास मंत्री उ०प्र०, श्रीमान गोविन्द सिंह महरा जी के रानीखेत निवास पर 9-9-1989 को एक ज्ञापन के सांथ मिला. योजना जो महिलाओं की दिनचर्याओं पर आधारित थी, चर्चा के दौरान यह स्पष्ट हुवा कि भूमिधरों को उनके विखरे खेतों की कुल भूमि एक सांथ चकों में मिलते ही यह योजना बागवानी के क्षेत्र में अवश्य ही क्रांतिकारी परिवर्तन लाएगी जैसा कि निदेशक उद्यान ने भी अपने पत्र में कहा है. इस पर मा० मंत्री जी ने प्रशन्नता व्यक्त करते हुए आश्वासन दिया कि भूमिबंदोबस्ती-चकबंदी के लिए वे स्वयं लखनऊ से तुरंत कार्यवाही करायेंगे. (इस पर लखनऊ में 27-9-1989 को राजस्व परिषद तथा चकबंदी विभाग उ०प्र० की बैठक हुई जिसमें अल्मोड़ा व पौड़ी में चकबंदी के कार्यालय खोलने का निर्णय हुवा….. इस पर आगे चर्चा करेंगे).

माननीय के सांथ इस बैठक में यह भी तय हुवा कि “भूमिबंदोबस्ती-चकबंदी होने तक झलोड़ी गाँव में इस योजना का एक मॉडल सूखा राहत योजना Dry Proon Area Programe (DPAP) के तहत तैयार किया जाय”. जिसके लिए पुन: अध्यक्ष, ग्राम विकास परिषद, खिरखेत द्वारा निदेशक उद्यान को प्रार्थना की गई जिस पर उनके द्वारा जिलाधिकारी से आग्रह किया गया कि उक्त कार्य को DPAP के तहत संपादित कराया जाय.

तत्पश्चात स्थानीय उपायुक्त रानीखेत से प्रार्थना की गई जिसके चलते उन्होंने एक निचित दिन में अपने ही कार्यालय में जिलाधिकारी अल्मोड़ा के सांथ हमारी बैठक कराई जिसमें उन्होंने भी “कास्तकार महिलाओं की योजना” की बारीकियों को समझते हुए कि “फल-पौधों को in-situ विधि से यानि यथास्थान पर बीजू पौंधों को बिना उखाड़े उन्हें कलमी बनाया जायेगा, इन पौंधों की कीमत मय गड्डे-खाद-पानी एवं रख-रखाव आदि की मेहनत के बदले उन्हें सब्जियां, दालें, मसाले, औषधीय पौंध आदि उपलब्ध कराई जायेगी”, उक्त योजना को DPAP के तहत क्रियान्वयन हेतु भूमि संरक्षण विभाग को सौंपा. (संलग्न- अध्यक्ष परिषद, निदेशक उद्यान, SDM, DM को पत्रादि क्रमवार 26 to 33 देखें).

केवला नन्द “फ़कीर”

बागवानी योजना एवं धनराशि हेतु मा० मंत्रीजी को ज्ञापन

बागवानी योजना एवं धनराशि हेतु मा० मंत्रीजी को ज्ञापन

5 दिसम्बर’ 17 (योजना एवं धनराशि हेतु मा० मंत्रीजी को ज्ञापन) बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…. इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.

बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें :-

2nd पोस्ट 5-12-2017

मित्रों,

जैसा आपने इसके पहले 17 नवम्बर की 1st पोस्ट में देखा कि हमारी परम्परागत खेती में रवि फसलों की पैदावार लागत सन 1985 में 52/- रूपये प्रति किग्रा० की दर तक बैठने के कारण हमने निदेशालय उद्यान से प्रार्थना कि थी कि वे हमारी ग्रामसभा की पूरी भूमि को समन्वित बागवानी योजना के तहत चकों में विकसित कराएँ ताकि कास्तकारों को उनकी पैदावारों से आर्थिक लाभ मिले. जिसके लिए 26 जुलाय 1988 को भेजे गये हमारे पत्र के प्रतिउत्तर में निदेशालय उद्यान से DHO को एवं DHO से ADO को जो पत्र भेजे थे उनकी फोटो भी आपने देखी हैं.

लेकिन खेद है कि निदेशालय में अनेक तकनीकि विशेषज्ञों के होते हुए भी उन्होंने कष्टमय कृषि कार्य कर रही ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक उत्थान के लिए कोई भी ठोस योजना नहीं दी. अंतत: बाध्य होकर भूमिधरों ने “ग्राम विकास परिषद्” नाम कि अपनी पंजीकृत संस्था के माध्यम से खुद योजना बनाई जिसे,

1a-d– ग्रामसभा की पूरी भूमि के लिए समन्वित बागवानी हेतु 2070210/- (बीस लाख सत्तर हजार दो सौ दस रुपयों) की 14 प्रष्ठों की एक योजना दि० 8 फरवरी 1989 में निदेशालय को सौंपी. जिसमें 1a से 1d तक मुख्य योजना व मोवाइल यूनिट का डिटेल मात्र यहाँ पर दिया जा रहा है. आवश्यक होने पर अन्यों का डिटेल भी दिया जाएगा.

2a-b– इसके क्रम में 8 फरवरी 89 को ही निदेशालय उद्यान द्वारा सहायक आयुक्त एवं संबंधितों को पत्र भेजे गए.

3- पुन: निदेशालय उद्यान के पत्र के क्रम में DHO अल्मोड़ा ने अपने पत्र दि० 6 अप्रेल 89 के द्वारा अध्यक्ष परिषद, मुझे एवं अन्यों को सलाह दी कि हम उक्त योजना के लिए किसी व्यवसायिक बैंक से लोन ले लें.

4a-b– इस पर 28 अप्रेल 89 के पत्र द्वारा स्पष्ट किया गया कि लोन लेकर भूमिधरों/कास्तकारों को दोहरी समस्याओं में उल्झाने के बजाय पर्वतीय क्षेत्र के विकास हेतु सरकारों द्वारा चलाई जा रही नाना प्रकार की योजनाओं के अंतर्गत किसी एक योजना के तहत इस क्षेत्र को भी उक्त योजनाबद्ध तरीकों से विकसित किया जाय.

5a-b– अध्यक्ष ग्राम विकास परिषद् द्वारा दि० 18 जून 89 को मा० मुख्य मन्त्री उत्तरप्रदेश को भी पत्र दिया गया कि राज्य अथवा केंद्र सरकार की ओर से इस योजना के लिए बजट दिलाया जाय.

6a-b– इधर क्षेत्रीय ग्रामप्रधानों, जनप्रतिनिधियों, गणमान्यों आदि ने भी उक्त योजनानुसार क्षेत्र की अन्य 15 ग्रामसभाओं में भी इस योजना को तुरंत लागू कराने हेतु तत्कालीन वरिष्ट उपाध्यक्ष, पर्वतीय विकास परिषद, उत्तरप्रदेश, श्रीमान गोविन्द सिंह महरा जी, कैम्प रानीखेत को भी 9 सितम्बर 89 को एक ज्ञापन दिया.

7a-d– इसके तुरंत बाद 5 दिसम्बर 89 को परिषद की बैठक में ग्रामसभा के प्रत्येक गाँव के लिए महिला मंडल कि अध्यक्षाओं का मनोनयन कर उनके द्वारा 14 दिसम्बर के पत्र से SDM रानीखेत को संबोधित करते हुए अध्यक्ष पर्वतीय विकास परिषद उ०प्र० एवं अन्य संबंधितों को भी आग्रह किया गया कि क्षेत्र को फल-पट्टी के रूप में विकसित किया जाय. कृपया इन सभी पत्रों की फोटो भी देखें. सम्बंधितों की प्रतिक्रियायें अगली पोस्ट पर….. धन्यवाद.

केवला नन्द “फ़कीर”

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