उत्तराखंड पर्वतीय क्षेत्र में बिखरी कृषिभूमि की चकबंदी हेतु अरुणाचल प्रवास समय के पत्र-तथ्य.

उत्तराखंड पर्वतीय क्षेत्र में बिखरी कृषिभूमि की चकबंदी हेतु अरुणाचल प्रवास समय के पत्र-तथ्य.

उत्तराखंड का पर्वतीय क्षेत्र मानवता के लिए एक बरदान है जिसे मैंने उत्तराखंड से बाहर रह कर समझा. 1974 में देश
के पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश के कृषि-उद्यान विभाग में नियुक्त हुवा. विभाग के आदेशोंनुसार वहां के लिए फल-
पौंधे तथा नर्सरियों के लिए माली, बागवानों के लिए मधुमक्खियों के बक्से आदि आदि हेतु उद्यान निदेशालय
चौबटिया, रानीखेत मेरा आना जाना लगातार चलता रहा. इसबीच, यहाँ के फल-पौधों से अरुणाचल के किसानों की
दिन प्रति दिन सुधरती आर्थिक स्थितियों के मुकाबले हमारे पहाड़ के किसान 52/- रूपये प्रति किग्रा० की दर तक
बैठने वाली कृषि फसलों को ही लेने को मजबूर हैं…? यद्यपि, जागरूक किसानों का एक समूह सितोष्ण पौधशालाओं
के लिए सक्रिय था किन्तु इसकी भी 1984 में सेव में स्कैव नामक की बिमारी ने कमर ही तोड़ दी…?
ऐसी बिडम्बनाओं को देखकर पहाड़ के किसानों के बिखरे खेतों को पहले चकबंदी की प्रक्रिया के द्वारा इकट्ठा कराने
की सोच बनी. यों भी चकबंदी देश के विभन्न राज्यों में 1920 से लागू है तथा हमारे पडौसी राज्य हिमाचल प्रदेश ने
भी 1971 में पंजाब से पृथक राज्य मिलते ही इस चकबंदी की प्रक्रिया को पहले अपनाया. इसी प्रक्रिया के द्वारा यहाँ,
पहाड़ के किसानों के बिखरे खेतों को भी इकट्ठा कराने की जो कोशीस की गई वह आज 40 वर्षों बाद भी जारी है.
यद्यपि मा० हाईकोर्ट से संबंधितों को नोटिस जाते ही सरकार ने 2020-21 से चकबंदी कराने के आदेश दे दिए हैं तथा
हमारी जनहित याचिका के क्रम में सरकार की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में भी यह स्वीकारा है कि
रानीखेत के झलोड़ी गाँव के स्वैच्छिक चकबंदी के प्रस्ताव को बोर्ड आफ रेवन्यू भेज दिया गया था किन्तु इसके बाद
भी इन बीते वर्षों में आगे कोई कार्यवाही नहीं होना चकबंदी की प्रक्रिया में आने वाले अवरोध प्राकृतिक कम साजिशों
से भरे ज्यादा होने से शासन-प्रशासन एवं अन्यों की मंशा पर भी प्रश्न चिन्ह लगाते हैं?
इस सम्बन्ध के कुछ मुख्य पत्र-तथ्य जो मेरे अरुणाचल प्रवास के दौरान हुवे उन्हें फेसबुक पर क्रमवार 14 पोस्टों
में दिया गया है. इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में
फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.
केवला नन्द तेवाड़ी

चकबंदी मंच उत्तराखंड

मित्रो,
दैनिक जागरण 16 नम्बर, 2017 का समाचार शीर्षक “ कुमाऊं का चकबंदी गाँव बनेगा झलोड़ी ” उसमें 1985 से चले आ रहे
प्रयासों का जिक्र किया गया है जिससे तबकि फाइलों के पन्नों को देखने से लगता है कि “उत्तराखंड में चकबंदी आवश्यक क्यों?”
यह कल-परसों की कोई अचानक उपजी सोच नहीं है.
इस बारे में जल-जंगल जमीनों से जुड़े पौड़ी निवासी 81 वर्ष के बयोब्रद्ध आ० गणेश गरीब जी जैसे अनेक व्यक्तियों का मानना
है कि देश के अन्य पहाड़ी राज्यों की तरह सरकारों ने हमारे पूर्वजों के विखरे खेतों की कुल भूमि जिसकी जितनी है उतनी एक
सांथ चकों में अगर तभी दे दी होती तो निश्चय ही भूमिधर एक ही स्थान पर पूर्ण मनोयोग से कृषिजन्य कार्यों को अपनी

आर्थिकी का मुख्य श्रोत बनाकर अन्य बाहरी श्रोतों से होने वाली आय जैसे नौकरी-पेसा व सरकारी अनुदान आदि से गाँवों को
औद्योगिकरण की ओर लेजाते जिससे आज के यही गाँव शहरों में परिवर्तित हो रहे होते.
जबकि विकास के नाम पर सरकारी स्तरों से जो भी प्रयास हुए वे सब सोने के अन्डे देने वाली मुर्गी का हलाल करके रातों रात
मालामाल होने की होड़ में इस देव भूमि की आत्मा माने जाने वाले समृद्ध गाँवों को ही ऐसा लील गया कि आज हमारे हजारों
गाँव भूतिया गाँवों में तब्दील हो चुके हैं और हम खुद जमीन जायदाद वाले होकर भी खाना-बदोसों का जैसा जीवन जीने को
मजबूर हैं. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी आज इसकी पुष्टि करता है.
मित्रों, इस सम्बन्ध में ऐसा नहीं कि हम तब चुप थे, मेरा इन बीते 43 वर्षों (1974-2017) का व्यक्तिगत अनुभव आधारित कुछ
पत्राचार जो पुरानी फाइलों में पड़ा है, उसे यहाँ संक्षिप्त में देखिये कि :-

  • मैं 1974 में अरुणाचल प्रदेश (तब लोग उसे नेफा के नाम से जानते थे) के कृषि-उद्यान विभाग में नियुक्त हुवा. वहां की
    आबो-हवा व भौगोलिक परिस्थितियां हमारे उत्तराखंड जैसी ही होने के कारण वहाँ बागवानी विकास हेतु यहाँ चौबटिया, रानीखेत
    तथा हिमाचल व जम्मू-कश्मीर से प्रति वर्ष लाखों फल-पौंधों को लेजाकर वहां की हजारों हेक्टर भूमि में नाना प्रकार के फलों की
    पट्टियाँ तथा अनेकों पौधशालायें तैयार की गयी. वहां पर आज ठन्डे इलाकों में सेव व अखरोट ने अच्छी पकड़ बना ली है तथा
    कीवी फल की पैदावार विदेशी आयात को टक्कर देने की स्थिति में आ रही है. निचले इलाकों में संतरा, अन्नानास ने अच्छी
    पकड़ बनाई है तथा बड़ी इलायची 600/- 700/- रु० किलो के हिसाब से व्यापारी खेतों से पैदावार उठाकर सीधे अरब की बाजारों में
    निर्यात कर रहे हैं. इसे अगर ठीक से समझा जाय तो 2014 तक, अकेले बागवानी से 25-30 से 60-70 लाख रु० तक प्रतिवर्ष की
    आय लेने वाले अनेक किसान अरुणाचल में मौजूद हैं. बड़ी इलायची को बढ़ावा देने में सिक्किम राज्य का काफी योगदान है.
    कुल मिलाकर बागवानी विकास उस क्षेत्र में आम जन-समुदाय की आर्थिकी का केंद्र बनता जा रहा है.
  • जबकि यहाँ हमारे उत्तराखंड में भारत की आजादी (1947) के तुरंत बाद से ही उ०प्र० के इस पर्वतीय क्षेत्र (उत्तराखण्ड) की आबो-
    हवा में बागवानी विकास की अपार सम्भावनाओं को ध्यान में रख कर उद्यान एवं फल संस्करण के सांथ-सांथ अनुसंधान हेतु
    भी चौबटिया (रानीखेत) में निदेशालय उद्यान की स्थापना की गई थी. लेकिन यह आश्चर्य ही है कि चकबंदी के अभाव में हमारे
    कास्तकार अपने दूर-दूर विखरे खेतों में हल-बैल लेकर जुताई,
    बुवाई, देख-रेख हेतु आने-जाने में समय, श्रम व मजदूरी देकर 1985 में भी 52/- रूपये प्रति किग्रा० की दर तक बैठने वाली
    परम्परागत कृषि पैदावारें ही लेने को बाध्य थे. जो आज की परिस्थितियों में सैकड़ों रूपये प्रति किग्रा० हो गयी होंगी. हमने इन
    आकड़ों के आधार पर तभी 1985 में उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप व्यवसायिक सहकारी कृषि-बागवानी को चकबंदी के तौर पर
    देश के अन्य पहाड़ी राज्यों की भाँती तत्कालीन उत्तर प्रदेश के इस पर्वतीय क्षेत्र में भी अपनाने की पुरजोर पहल की जो आज
    2017 में भी जारी है.
    इस सम्बन्ध में 1985 से ही निदेशालय उद्यान एवं संबंधितों को मेरे द्वारा अरुणाचल प्रदेश से लिखे गए पत्रों में से कुछों को
    सिलसिलेवार यहाँ दिया जा रहा है जिनमें दि० 26 जुलाय 1988 के पत्र के प्रतिउत्तर में निदेशालय उद्यान से DHO को एवं DHO
    से ADO को पत्रों की फोटो भी देखें. सम्बंधितों की प्रतिक्रियायें अगली पोस्ट पर….. धन्यवाद.
    केवल नन्द “फकीर”
    7351026532
न्यायालय की पहल को भी समझें

न्यायालय की पहल को भी समझें

जैसा पूर्व ब्लॉग से ज्ञात है कि “उत्तराखंड पर्वतीय क्षेत्र जोत चकबंदी एवं भूमि व्यवस्था विधेयक 2016” पास होने के बाद स्वैच्छिक चकबंदी हेतु वर्षों से तैयार अनेक गांवों में शासनादेशों के तहत सम्बन्धित अधिकारियों के भ्रमण/निरिक्षण होने के बाबजूद भी मूलनिवासियों की बिखरी कृषिभूमि की चकबंदी नहीं कराके 2018 में पूंजीपतियों के लिए नया भू क़ानून पास कर दिया गया…  इसे देखकर मा० हाईकोर्ट की सरण जाने के अलावा हमारे पास और कोई भी विकल्प नही होने से जब अपने पहाड़ी वकीलों से सम्पर्क किया तो उन्होंने भी हाँ हाँ तो कहा किन्तु इसे मा० हाईकोर्ट में दायर नहीं किया जा सका तो मा० सुप्रीमकोर्ट में कार्यरत उन बाहरी राज्यों के वकीलों से सम्पर्क किया गया जहां चकबंदी हुई है. इसी बीच जब उन वकीलों के द्वारा 2020 में जनहित याचिका तैयार होने लगी तो मा० न्यायालय की फटकार से बचने के लिए सरकार ने आनन फानन में 2016 से पास वो चकबंदी विधेयक/एक्ट जिसे Blog-2 में दिया गया है, को लागू कराकेउत्तराखंड पर्वतीय क्षेत्र जोत चकबंदी एवं भूमि व्यवस्था नियमावली 2020भी कैविनेट से पास कर दी तथा पहाड़ में चकबंदी का कार्य करने के लिए राजस्व विभाग को ही दायित्व दे दिया गया है.

लेकिन फिर भी किसी भी गाँव में धरातल पर जब कार्य नहीं हुवा तो अंतत: नवम्बर 2020 में सुप्रीमकोर्ट के वकीलों द्वारा तैयार उक्त जनहित याचिका 2 जनप्रतिनिधियों (विधायक रानीखेत तथा कृषि-उद्यान मंत्री उत्तराखंड) तथा 6 अधिकारियों (मुख्य सचिव उख०, राजस्व सचिव उख०, जिलाधिकारी अल्मोड़ा, मुख्य विकास अधिकारी अल्मोड़ा, उप जिलाधिकारी रानीखेत एवं तहसीलदार रानीखेत) को नामित करते हुए मा० हाईकोर्ट नैनीताल में दायर होते ही संबंधितों को नोटिस जारी हुए जिन्हें तत्कालीन समाचारोंयुक्त इन links

6-11-20 चकबंदी के लिए नैनीताल हाईकोर्ट में जनहित याचिका

25-11-20 चकबंदी के लिए नैनीताल हाईकोर्ट में सुनवाई शुरू हुई… न्यायालय का आभार!

23-12-20 पहाड़ी किसानों के हित में चकबंदी हेतु न्यायालय की एतिहासिक पहल

23-12-20 Times of India… Agri minister & Ranikhet MLA sent notices over ‘non-implementation’ of Uttarakhand Hills Consolidation of Holdings and Land Reforms Act

24-12-20 चकबंदी हेतु माननीयों को नोटिस जारी

27-12-20 नैनीताल माननीय उच्च न्यायालय ने 3 सप्ताह मे राज्य सरकार, कृषि मंत्री, कृषि सचिव, एंव रानीखेत विधायक से पर्वतीय इलाको मे बिखरी खेती पर चकबन्दी लागू कराने हेतु जबाव माँगा है लेकिन संबंधितों को उपरोक्त नोटिस जारी होने के उपरांत 2021 में सरकार की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में यह स्वीकारने के बाद भी कि रानीखेत के झलोड़ी गाँव के स्वैच्छिक चकबंदी के प्रस्ताव को बोर्ड आफ रेवन्यू भेज दिया गया था किन्तु इसके बाद इन बीते वर्षों में भी आगे कोई कार्यवाही नहीं हुई… link पर देखें. तथा जिलाधिकारी अल्मोड़ा की ओर से सभी उप जिलाधारियों को शासनादेश भी निर्गत हुवे हैं कि उक्त चकबंदी नियमावली 2020 में उल्लिखित नियमों/प्रावधानों के अंतर्गत गाँवों में चकबंदी की कार्यवाही करना सुनिश्चित करें. इस शासनादेश की फोटो भी देखें जिसे जानबूझकर अस्पष्ट ही प्रेषित किया गया है ताकि कहने को हो गया कि हमने तो शासनादेश भी जारी कर दिए थे.

लेकिन शासन-प्रशासन चकबंदी के लिए अब हमारे सहखातेदारों का बिरोध दिखाकर तथा मामला न्यायालय में विचाराधीन है कहकर चकबंदी को रोक रहा है जबकि इन्हीं खेतों को बेचते वक्त किसी भी सहखातेदार का हक़ दिखाकर चुपके छुपके बिकवा देने का ये दोहरा चरित्र क्यों? धोखे से बेचे गये खेतों के मालिक अब न्यायालयों के चक्कर लगाने को भी मजबूर हैं Link

इसलिए अब ग्रामीणों द्वारा निर्णय लिए जा रहे हैं कि वे आपसी सहमति से अपने खेतों को परस्पर अदल बदलकर खुद ही अपने अपने चक बनाये तथा इन चकों के अंदर आ रहे खेतों को पुराने गोलखातों से निकालकर आगे के लिए चकस्वामी के व्यक्तिगत नाम पर कराए जाने हेतु अपनी तहसीलों को आवेदन करें ताकि खेत व्यक्तिगत नाम पर होने से फिर इन्हें बिना लिखित अनुमति के कोई दूसरा बेचने नहीं सकेगा.

ज्ञात हों, चकबंदी एक्ट के नियमों/प्रावधानों के अंतर्गत कास्तकारों के बिखरे खेतों को इकट्ठा चकों में कराने की भूमिधरों को कोई रजिस्ट्री फीस नहीं देनी होती, यह सुविधा निशुल्क दी जाती है. जबकि सामान्य प्रक्रिया के तहत खेतों को खरीदकर इकट्ठा चकों में करने हेतु प्रतिनाली कम से कम 20000/- (बीस हजार) रूपये रजिस्ट्री फ़ीस देनी होती है. यदि खेत सड़क, स्कूल, स्वास्थ केंद्र आदि की सुविधायुक्त स्थान पर अथवा इसके नजदीक हो तो रजिस्ट्री फ़ीस/सर्कल रेट भी उसीनुसार और भी ज्यादा होते हैं.  

चकबंदी क्या है ?

चकबंदी क्या है ?

 

 

 

अब बात करते हैं चकबंदी की

   चकबंदी क्यों और कैसे?:- जैसा कि पहले बताया गया है, 1960-62 तक 12 भूमिबंदोबस्तों के दौरान हमारे बुजुर्गों ने अपने अपने परिवार के लिए छोटे-बड़े आकार के जो सैकड़ों खेत बनाये वे जहां तहां दूर दूर होने से उनमें बैलों अथवा मशीनों से जुताई, बुवाई व फसलों की जंगली जानवरों से सुरक्षा एवं देख-रेख आदि की समस्याओं को कम करते हुवे व्यवस्थित तरीकों से आधुनिक कृषि-बागवानी-पशुपालन आदि की पैदावारों को बढाने के उद्देश्य से सरकारों द्वारा किसानों को उनके जहां तहां बिखरे इन खेतों की कुल भूमि एक-दो स्थानों पर बिना कोई फ़ीस लिए इकट्ठी देने की प्रक्रिया को “चकबंदी” कहते हैं. यह दो प्रकार की होती है—अनिवार्य एवं एच्छिक/स्वैच्छिक.इस प्रक्रिया के तहत प्रत्येक खेत गोलखाते की सहखातेदारी से निकलकर आगे के लिए प्रत्येक चकस्वामी के व्यक्तिगत नाम पर भी रिकार्ड में दर्ज हो जाता है. इससे किसान को अपने व्यक्तिगत चक के अंदर बड़े उद्यम करने के लिए व्यवसायिक बेंकों से ऋण आदि लेने हेतु किसी से निरापत्ति प्रमाण पत्र आदि लेने की बाध्यता भी समाप्त हो जाती है. 

  हमारे देश में यह चकबंदी 1920 से लागू है. यही हमारा पडौसी राज्य हिमाचल प्रदेश ने 1971 में पंजाब से पृथक राज्य मिलते ही सबसे पहले अपने भूमिधरों के लिए यह चकबंदी लागू की जिसके चलते हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था उद्यान आधारित है. लेकिन हमारे पहाड़ में यह चकबंदी भी आज तक लागू नहीं हो पाई है?

  इस सम्बन्ध में कहना है कि 1960-62 के बाद भूमिबन्दोंबस्त रोकना, कुजा एक्ट भी लागू कराना, इस सीमित कृषिभूमि को गोलखातों में दूर दूर खेतों में बिखरे रहने देना, बंदरों-सुवरों-बाघों आदि हिंसक जानवरों को बढाना, चकबंदी एक्ट पास होते हुए भी उसे लागू नहीं कराना, करोड़ों हेक्टर कृषिभूमि को बंजड होने देना आदि आदि से लगता है किसी बहुत बड़ी साजिस के तहत ये सब हो रहा है. जबकि, 1985 में ही हमने तत्कालीन उत्तर प्रदेश शासन को पहाड़ के इन दूर दूर बिखरे सीढ़ीदार खेतों में फसलों की पैदावार लागतें तब 52/- रूपये प्रति किग्रा० तक बैठने के आंकड़े प्रस्तुत किये हैं.

 

 

 दूर दूर बिखरे सीढ़ीदार खेतों में हलिया-हल-बैल लेकर या मशीनों से जुताई-बुवाई-निराई व समय समय की देख-रेख के चलते पैदावार लागतों को देखकर मामले ने जब काफी तूल पकड़ा तो उत्तर प्रदेश शासन द्वारा 1991 में कुमाऊं मंडल के लिए अल्मोड़ा में तथा गढवाल मंडल के लिए पौड़ी में, दो चकबंदी आफिस भी खोले गये. 1996 में इन आफिसों की प्रोग्रेस मांगी तो पता चला कि पहाड़ के लिए अलग “चकबंदी एक्ट” होना होगा. जिसके लिए डा० आर.एस. टोलिया जी की अध्यक्षता में पहली चकबंदी समिति बनाई गई तथा 2000 में पृथक राज्य उत्तराखंड बनने के बाद भी उक्त “चकबंदी एक्ट” के लिए समीतियों के उपर समीतियाँ बनती रही जबकि अनेकों गाँव स्वैच्छिक चकबंदी हेतु भी तैयार हो गये थे. इस पर भी शासन द्वारा बताया गया कि चकबंदी के लिए 250 गाँवों का चयन किया जा चुका है… लेकिन सूचना का अधिकार द्वारा पूछने पर ज्ञात हुवा कि चकबंदी के नाम पर कहीं 8-9 लाख रुपयों की घेर-बाड़ की योजना दी गई है तो कहीं कहीं के लगभग 200 ग्रामाप्रधानों से लिखवा लिया गया कि वे चकबंदी नहीं करेंगे और जबरदस्ती चकबंदी कराई गई तो वे बिरोध भी करेंगे…

इन स्थितियों को देखकर कि 1996 से पहाड़ के लिए चकबंदी एक्ट बनाये जाने हेतु सरकारों द्वारा अनेकों समितियां/कमेटियां बनती चली गई लेकिन इन बीते 20 वर्षों में न तो चकबंदी एक्ट बना न इसकी नियमावली, तो, जमीनी स्तर पर कार्य कब होगा? अंतत: 2015-16 में रानीखेत तहसील की ग्रामसभा झलोड़ी के भूमिधरों द्वारा निर्णय लिया गया कि उनकी ग्रामसभा को उन्हीं के द्वारा सुझाए गये 8 (आठ) बिन्दुओं की नियमावलीनुसार पहले एक “चकबंदी मॉडल” के रूप में विकसित कराया जाय.

 

 

ग्रामसभा झलोड़ी के भूमिधरों द्वारा लिए गये इन निर्णयों का पहाड़ के सभी चकबंदी शुभचिंतकों ने भी जून 2016 में कोटद्वार की बैठक में इसका पूर्ण समर्थन करते हुए मा० मुख्यमंत्री उत्तराखंड को प्रार्थना की गई. इसके क्रम में “विधानसभा सत्र जुलाय 2016” के द्वारा उत्तराखंड पर्वतीय क्षेत्र जोत चकबंदी एवं भूमि व्यवस्था विधेयक 2016 के नाम से चकबंदी एक्ट पास होते ही झलोड़ी ग्रामसभा में “स्वैच्छिक चकबंदी मॉडल” के साथ साथ ग्रामसभा कारचूली में भी “आंशिक चकबंदी मॉडल” हेतु जिलाधिकारी अल्मोड़ा एवं भूमिबंदोबस्त अधिकारी रुद्रपुर की टीमों ने अपने निरिक्षण भी किये. भूमि बंदोबस्त अधिकारी रुद्रपुर की टीम को उनके निरिक्षण के दौरान “ चकबंदी मॉडल झलोड़ी “ का मास्टरप्लान समझाते हुए भी देखें…

किन्तु कुछ समय बाद पता चला कि इन गाँवों को दरकिनार करके गढवाल मंडल में माननीयों के गांवों को चकबंदी हेतु नोटिफाई कर लिया गया है, लेकिन आज तक वहां भी कुछ नही हुवा. अर्थात यह सोचने वाली बात है कि इतना सब होने के बाबजूद भी न तो सरकार ने 1960-62 से बंद भूमिबंदोबस्त को खोला और न किसानों को उनकी दूर दूर बिखरे खेतों की कृषिभूमि एक-दो स्थानों पर चकों में देने के लिए कोई कदम उठाया, जबकि इस बीच दर्जनों गाँव स्वैच्छिक चकबंदी के लिए तैयार हो गये.

इधर, यह पूछे जाने पर कि स्वैच्छिक चकबंदी के लिए वर्षों से तैयार गांवों का शासनादेशों के तहत विभागों द्वारा निरिक्षण होने के बाबजूद भी इन्हें क्यों दरकिनार किया गया? तो बताया गया कि रानीखेत तहसील अंतर्गत “ स्वैच्छिक चकबंदी चाहने वाले ग्रामीणों ने योजना भी बनाकर देनी चाहिए थी जो नहीं दी गई “. किन्तु वही, गढ़वाल मंडल में नेताओं के गांवों को चकबंदी के लिए नोटिफाई भी करने से पहले क्या उन गांवों के ग्रामीणों ने भी योजना दी थी? इसकी सूचना RTI द्वारा मांगने पर ज्ञात हुवा कि “ वहां के ग्रामीणों से कोई भी योजना नहीं ली गई “. तो एक राज्य में ये दोहरे नियम/प्रावधान क्यों?   

इससे स्पष्ट होता है कि शासन-प्रशासन में घुसे भूमाफियाओं को जब यह भान हो गया कि पहाड़ में चकबंदी होते ही अधिकांस किसान जिनकी 1960-62 के बाद भूमिबंदोबस्त नहीं होने व परिवार बढ़ते जाने के कारण 2-4 नाली कृषिभूमि भी नहीं रह गई है, वे जो, कृषिजन्य उद्योगों में रूचि रखते हैं, इस चकबंदी के बाद अपनी अपनी कृषिभूमि तुरंत बढाने के लिए अपने गाँवों के आजू बाजू की बेनाप भूमि को भी आवाद करेंगे जो उनका “मूलनिवास अधिकार” भी है. तो ऐसे में पूंजीपति भूमाफियाओं द्वारा इन्वेस्टमेंट समिट के बहाने पहाड़ के बड़े बड़े भूखंडों को पहले ही कब्ज़ाने हेतु 12.5 एकड़+ यानि 250 नाली से भी ज्यादा (अनलिमिटेड) जमीन के बड़े बड़े अपने अपने चक बनाये जाने हेतु आनन फानन में 6 अक्टूबर 2018 को नया भू क़ानून पास कर दिया गया. जबकि चकबंदी हो जाने से बड़ी बड़ी कृषिभूमि वाले अनेकों मूलनिवासियों को भी स्थानीय संसाधनोंनुसार प्रोजेक्टों की स्थापना में इन्वेस्ट करने का मौका मिला होता अथवा उन्हें भी प्रोजेक्टों में सहभागिता निभाने का मौका दिया जाना चाहिए था. इसीलिए भू कानून के हल्ले ने सरकार को अपनी इस एकतरफा नीति पर पुन: सोचने को मजबूर किया है तथा लोगों से उनके विचार भी मांगे हैं.

 

 

 

 

 

 

 

उत्तराखंड पहाड़ में अपनी कृषिभूमि को कैसे बचायें और बढायें ?

उत्तराखंड पहाड़ में अपनी कृषिभूमि को कैसे बचायें और बढायें ?

इसके लिए पहले भूमिबंदोबस्त एवं चकबंदी इन दोनों प्रक्रियाओं को ठीक से समझना होगा

 

भूमिबंदोबस्त वह प्रक्रिया है जिसमें परिवार बढने के साथ साथ कृषि-बागवानी की उपज भी बढाये जाने हेतु नये खेतों का निर्माण किया जाता है. तथा रिकार्ड रखने के लिए प्रत्येक परिवार के प्रत्येक खेत को एक एक नम्बर देकर उनके कुल खेतों को एक संयुक्त खाता के अंतर्गत लेकर इन खेतों का रिकार्ड राजस्व विभाग के पास सुरक्षित रहता है. इस खाते को गोलखाता के नाम से भी जाना जाता है जिसके अंतर्गत के प्रत्येक खेत में परिवार के सभी सदस्यों का सहखातेदारी के तौर पर बराबर का हिस्सा होता है.

     उत्तराखंड के पहाड़ों में भी खेत बनाने हेतु हमारे पूर्वजों को कृषि-बागवानी-पशुपालन आदि के लिए जहां भी जल-जंगल-जमीन की सुविधा मिली उन्होंने पहाड़ काट काट कर सीढ़ीदार खेत बनाये और उनमें पोषक तत्वोंयुक्त मिटटी को भी संरक्षित किया ताकि फसलों की अच्छी पैदावारें हो.

     जैसा रिकार्डों में उपलब्ध है, हमारे पहाड़ में अंग्रेजों के समय 11 भूमिबंदोबस्त हुवे. उन्होंने पहला भूमिबंदोबस्त 1815-16 में किया तथा अंतिम 11वां 1928 में हुवा. इसके बाद भारत सरकार द्वारा 12वां भूमिबंदोबस्त 1960-62 में हुवा. लेकिन इसके बाद पहाड़ में भूमिबंदोबस्त की इस प्रक्रिया को रोक कर नए खेत बनाने बंद कर दिए गये. जबकि राज्य के तराई-भाबर व अन्य मैदानी क्षेत्रों में यह प्रक्रिया निरंतर चल रही है… तो ये दोहरा माप-दंड, सिर्फ उत्तराखंड के पहाड़ के लिए ही क्यों? क्या यह भूमाफियाओं की कोई साजिस तो नहीं, जिसे जनता एवं सरकारों को भी समझना होगा.

 

 

 

  पहाड़ में 1960-62 की भूमिबंदोबस्ती के रिकार्डों को देखने से प्रत्येक परिवार के पास तब लगभग 100 नाली कृषिभूमि थी जो इन बीते वर्षों में, यानि 2023-24 तक दो-तीन भूमिबंदोबस्त और हो जाने चाहिए थे जिससे गाँवों में प्रत्येक किसानों के पास आज कम से कम 60-70 नाली (एक नाली = 2000 वर्गफुट/ 1 एकड़ = 20 नाली/ 1 हे० = 50 नाली) भूमि होती तो निश्चित ही कृषिजन्य कार्यों के सहारे लोग गाँवों में रहते तो संयुक्त परिवार भी कायम रहते जिससे आवादी बढने से स्वास्थ चिकित्सा, शिक्षा, पशुपालन, मौनपालन आदि अनेक और उद्योग भी पनप रहे होते तो मूलनिवास-भूकानून-रोजगार जैसी अनेकों समस्याओं का भी स्वत: ही निदान हो रहा होता! किन्तु जैसा दिख रहा है, भूमिबन्दोबस्त रोककर नये खेत नहीं बनने से परिवारों के बढने के अनुपात में वही लगभग 100 नाली भूमि अब परिवार के प्रत्येक सदस्य के पास घटकर 2-4 नाली भी नही रह जाने से जहां उन्हें रोजगार की तलास में गाँवों से दूसरे राज्यों की ओर पलायन के लिए मजबूर कराके हजारों गांवों को जनविहीन होने दिया गया है वहीं पुनर्विकास के नाम पर करोड़ों/अरबों की योजनाओं को ठिकाने लगाते हुवे पूंजीपतियों को 12.5 एकड़+ यानि 250 नाली से भी अधिक भूमि एक साथ चकों में देने के लिए 2018 में इन्वेस्ट समिट के नाम से नया भूकानून भी लागू कर दिया… जो एक साजिस भरी मंसा भी हो सकती है कि पहाड़ के मूलनिवासी किसानों को इस भूमि से बंचित ही रखकर धीरे धीरे पूंजीपतियों की झोली में डाल दिया जाय तथा इसके रिकार्ड आगे 13वां भूमिबंदोबस्त के नाम से भी जाने जा सकते हैं

 

उत्तराखंड भूमि सुरक्षा – चकबंदी और अनुच्छेद 371 पर चर्चा

उत्तराखंड भूमि सुरक्षा – चकबंदी और अनुच्छेद 371 पर चर्चा

 

 

 

✅ पोस्ट 1 – उत्तराखंड में भूमि सुरक्षा, चकबंदी और अनुच्छेद 371 पर बैठक – 15 मार्च 2017

बैठक का उद्देश्य:

उत्तराखंड की भूमि व्यवस्था, पर्वतीय कृषि संकट, पलायन, और राज्य की संवैधानिक सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श कर ठोस सुझाव तैयार करना।

बैठक का स्थान एवं मुख्य वक्ता:

दिनांक: 15 मार्च 2017
स्थान: गोविंदपुर गरवाल, हल्द्वानी (निवास स्थान – श्री केवला नन्द तेवाड़ी)
मुख्य आमंत्रित वक्ता: श्री श्याम सिंह रावत, निवासी – बिन्दुखत्ता, लालकुंवा

प्रमुख प्रतिभागी:

  1. श्री टी. एस. दानू
  2. श्री डी. एस. बुन्गला
  3. श्री बी. एस. धामी
  4. श्री जगदीश कांडपाल
  5. श्री डी. एस. कोटलिया
  6. श्री सुन्दर सिंह टाकुली
  7. श्री जी. बी. जोशी
  8. श्री ए. पी. मठपाल
  9. श्री ईश्वरीदत्त भट्ट
  10. श्री मयंक लोहनी
  11. श्री रविंदर सिंह
  12. श्री लीलाधर ब्रिजवासी
  13. श्री शेर सिंह बिष्ट
  14. श्री श्याम सिंह रावत
  15. श्री केवला नन्द तिवाड़ी

चर्चा का सारांश:

उत्तराखंड राज्य बनने के बावजूद स्वास्थ्य, शिक्षा, यातायात, संचार और रोजगार जैसी मूलभूत समस्याएँ जस की तस बनी हुई हैं।

पर्वतीय क्षेत्र में तेज़ी से पलायन हो रहा है।

खेत-खलिहान बंजर हो रहे हैं तथा ग्रामीण अपनी पैतृक भूमि तक की पहचान खो चुके हैं।

यह स्थिति उत्तराखंड की अस्मिता और अस्तित्व के लिए गंभीर चुनौती है।

सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव:

  • संविधान का अनुच्छेद 371 अन्य हिमालयी राज्यों की तर्ज पर उत्तराखंड में लागू किया जाए।
  • उत्तराखंड को आधिकारिक रूप से हिमालयी राज्यों की श्रेणी में सम्मिलित कर विशेष आर्थिक सहायता दी जाए।
  • जल-जंगल-जमीन एवं जनजीवन संरक्षण हेतु हिमालय मंत्रालय की स्थापना।
  • “हिमालय परिषद” का गठन कर केन्द्र सरकार में विशेष महत्व दिया जाए।
  • चीन की तरह हिमालयी क्षेत्रों को संचार, यातायात एवं आधारभूत सुविधाओं से संपन्न किया जाए।
  • राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 2000 में संशोधन कर हरिद्वार व ऊधमसिंहनगर जिलों को उत्तर प्रदेश में वापस किया जाए।
  • पर्वतीय कृषि के पुनरुत्थान हेतु व्यावहारिक योजनाएँ बनाई जाएँ।
  • पर्वतीय क्षेत्रों में चकबंदी लागू की जाए व चयनित गाँवों को मॉडल गाँव बनाया जाए।

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✅ पोस्ट 2 – मुख्यमंत्री को भेजा गया पत्र – उत्तराखंड को अनुच्छेद 371 के तहत संरक्षण देने की मांग

पत्र का सारांश:

15 मार्च 2017 की बैठक में लिए गए निर्णयों के आधार पर 6 अप्रैल 2017 को माननीय मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को एक पत्र प्रेषित किया गया। इस पत्र में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर बल दिया गया:

प्रमुख मांगें:

  • संविधान का अनुच्छेद 371 और सैक्सन-18 को उत्तराखंड में लागू कर विशेष भूस्वामियों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करना।
  • उत्तराखंड को देश के अन्य हिमालयी राज्यों के समान विशेष आर्थिक सहायता प्रदान की जाए।
  • हिमालय क्षेत्र के जल-जंगल-जमीन एवं जन-जीवन संरक्षण हेतु विशेष मंत्रालय की स्थापना की जाए।
  • पूर्वोत्तर परिषद की तर्ज पर “हिमालय परिषद” का गठन किया जाए।
  • चीन द्वारा तिब्बत क्षेत्र में किये जा रहे विकास के समान हिमालय क्षेत्र को संचार, यातायात आदि से समृद्ध किया जाए।
  • राज्य पुनर्गठन अधिनियम-2000 में संशोधन कर हरिद्वार और उधमसिंहनगर जिलों को उत्तर प्रदेश में वापस कर उत्तराखंड को पर्वतीय राज्य का स्वरूप दिया जाए।

पत्र की भावना:

राज्य गठन के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए यह पत्र संवैधानिक सुरक्षा और विशेष आर्थिक सहायता के महत्व को उजागर करता है।

प्रदेश के निवासियों के साथ-साथ भूतिया गांवों, पलायन व अन्य गंभीर समस्याओं पर भी जोर दिया गया।

पत्र की पूरी जानकारी और शुभचिंतकों के कमेन्ट भी इस लिंक देखें

सेवा में,

श्रीमान त्रिवेंद्र सिंह रावत

माननीय मुख्य मन्त्री

उत्तराखंड, देहरादून.

विषय :- उत्तराखंड को संबिधान के अनुच्छेद – 371 तथा सैक्सन – 18 के प्रावधानों के अंतर्गत संरक्षण प्रदान कराने बाबद प्रार्थना.

महोदय,

उत्तराखण्ड राज्य के नवें मुख्यमन्त्री के रूप में कार्यभार ग्रहण करने पर आपको बधाई एवं शुभकामनायें ! हम आशा करते हैं कि जिस उद्देश्य के लिए इस पहाड़ी राज्य का गठन किया गया था उसकी दशा एवं दिशा को आपके कार्यकाल में निश्चित रूप से एक सकारात्मक दिशा मिलेगी व राज्य विकास की ओर अग्रसर होगा.

महोदय, उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र की समस्याओं पर गत 15 मार्च, 2017 को हल्द्वानी में एक चर्चा आयोजित की गयी जिसमें वक्ताओं द्वारा अत्यंत दुख व्यक्त करते हुए कहा गया है कि प्रथक उत्तराखंड राज्य की मांग जिन कारणों से उठाई गयी थी, अलग राज्य गठन के बावजूद वे न केवल अब भी मौजूद हैं, बल्कि और भी अधिक पीड़ादायक और जटिल हो गयी हैं जिनमें,

– स्वास्थ-शिक्षा-व्यवसाय-यातायात-संचार जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में लोग अपने बसे-बसाए घर-गाँव छोड़ रहे हैं जिससे हजारों गाँव भूतिया गाँवों में तब्दील हो चुके है.

– जिन गाँवों में अभी भी कुछ लोग बचे हैं उनके पशु व बाल-बच्चे भी जंगली जानवरों की चपेट में आने से वे भी बहुत तेजी से गाँव छोड़कर जहां-तहां शहरों की झुग्गी-झोपड़ियों में दयनीय स्थितियों में भटकने लगे हैं. ऐसे में यदि किसी के बाल-बच्चे अपने घर-गाँव वापस जाना भी चाहते हैं तो उनके घर खँडहर व जमीन बंजर होने से उनको ये भी पता नहीं है कि उनके पूर्वजों के खेत कहाँ-कहाँ हैं तथा अब तो हजारों गाँवों की स्थिति ये हो गयी है कि गाँवों में उनसे आ बैठ कहने वाला भी कोई नहीं है.

– शहारों व कस्बों में भी स्कूली शिक्षा के बाद तकनीकि शिक्षाओं के अभाव में विद्यार्थियों को अपना भविष्य अंधकारमय होने की आशंका के डर से वे भी शहरों की ओर रुख करना शुरू करने लगते हैं जिससे हमारा युवावर्ग मैदानी भागों की शिक्षा के बाद उधर ही जीविका की गुजर बसर करने को मजबूर होता है.

यह सब हमारे राजनैतिक नेतृत्व, प्रशासक, बुद्धिजीवी तथा आन्दोलनकारी शक्तियों तथा चुनी हुई सरकारों के होते हुए हमारे ग्रामीणों के अलावा समस्त पहाड़ की अश्मिता एवं संप्रभुता के सांथ भी क्रूरतापूर्ण मजाक हो रहा है. इन सारी समस्याओं का पहाड़ के हित में तुरंत निदान हेतु, सर्वसम्मति से तय किया गया कि हमारी नयीं विधानसभा के सम्मुख निम्न बिन्दुओं को अबिलम्ब रखा जाय :-

1- बिधान के अनुच्छेद – 371 को देश के अन्य हिमालयी राज्यों की तर्ज पर उत्तराखण्ड राज्य में भी लागू कराते हुए सैक्सन – 18 के प्रावधानों को भी लागू कराया जाय :- महोदय, जैसा विदित है कि हमारा हिमालयी राज्य उत्तराखंड चीन के नियंत्रण वाले तिब्बत तथा नेपाल जैसी अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं से घिरा होने के बाबजूद यहाँ के निवासियों के लिए देश के अन्य सभी हिमालयी राज्यों की तरह कोई संबैधानिक संरक्षण की व्यवस्था नहीं की गयी है. अत: संबिधान के अनुच्छेद – 371 को उत्तराखंड राज्य के हित में सैक्सन – 18 के प्रावधानों को जैसाकि ये हिमाचल प्रदेश में लागू हैं, इसे यहाँ भी तुरंत लागू कराया जाय ताकि अन्य हिमालयी राज्यों की तरह यहाँ भी कोई बाहरी व्यक्ति जहां-तहां जमीन ना खरीदने सके जिसका सीधा व चिरस्थाई लाभ भूस्वामियों को मिले. इसके लिए तत्काल प्रभाव से एक बोर्ड का गठन किया जाय. जिसमें सरकारी उच्चाधिकारी, भूमि विशेषज्ञ व ग्राम पंचायतों आदि को भी अनुभव के आधार पर आवश्यकतानुसार शामिल किया जाय.

2- देश के सभी हिमालयी राज्यों में उत्तराखण्ड को भी सम्मिलित किया जाय एवं उनके समान आर्थिक सहायता प्रदान की जाय :- संबिधान के अनुच्छेद – 370 द्वारा जम्मू-कश्मीर के हितों की रक्षा की गयी है, जबकि अनुच्छेद- 371 के अंतर्गत पूर्वोत्तर के आठ राज्यों— सिक्किम, असम, मेघालय, अरुणाचल, नागालेंड, मणिपुर, मिजोराम और त्रिपुरा के सांथ-सांथ आंध्र प्रदेश तथा गोवा जैसे राज्यों के लिए भी इसी अनुच्छेद के तहत विशेष प्रावधानों में इन राज्यों के निवासियों को अनेक प्रकार की सुविधाओं के अलावा इनकी सभ्यता, संस्कृति तथा परम्पराओं को संरक्षण भी मिला हुवा है. हमारे पडौसी राज्य हिमाचल प्रदेश में भी ऐसे अनेक प्राविधान लागू हैं जिनका अतिक्रमण कोई बाहरी व्यक्ति नहीं कर सकता. अत: ऐसी सहायता उत्तराखंड को भी मिलनी चाहिए.

3- हिमालयी क्षेत्र के जल-जंगल-जमीन तथा जन-जीवन के संरक्षण-संवर्धन हेतु प्रथक मंत्रालय की स्थापना की जाय :- इस सम्बन्ध में भी पूर्वोत्तर के सामाजिक-आर्थिक विकास कार्यों के समुचित कार्यान्वयन हेतु “पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय” का गठन किया गया है जिसे “डोनर मंत्रालय” के नाम से जाना जाता है जो केन्द्रीय मंत्रालयों, विभागों, नीति-निर्माताओं और अन्य सम्बद्ध पक्षों के सम्मुख इस क्षेत्र के पैरोकार और समन्वयक का कार्य करता हुवा उनके विकास हेतु प्राथमिकताओं तथा जरूरतों के अनुसार योजनायें और परियोजनाएं बनाता व उनके नियोजन, कार्यान्वयन की निगरानी भी करते हुए उनकी वार्षिक और पंचवर्षीय योजनाओं की रूप-रेखा बनाने में मदद के अलावा उनके लिए वित्तीय प्रबंध भी करता है. इसी तर्ज पर पश्चिमी हिमालयी राज्यों (उत्तराखंड-हिमाचल व जम्मू-कश्मीर) के लिए भी “पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र विकास मंत्रालय” के गठन की व्यवस्था की जाय.

4- “पूर्वोत्तर परिषद्” की तर्ज पर “हिमालय परिषद्” का गठन किया जाय तथा केन्द्रीय मन्त्रीमंडल/ सरकार में हिमालयी क्षेत्र को विशेष महत्व प्रदान किया जाय :- विदित हो कि “पूर्वोत्तर परिषद्” का मुक्य कार्य क्षेत्रीय विकास की योजनायें बनाना, राज्य सरकारों व अन्य संस्थाओं की परियोजनाओं की देखरेख, निगरानी व इन्हें पूर्ण करना है. इस परिषद् ने पूर्वोत्तर विजन-2020 तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र के विकास के लिए भारत सरकार द्वारा कुछ अन्य संस्थाओं का भी गठन किया गया है जैसे-

  1. उत्तर-पूर्वी क्षेत्रीय वित्त विकास निगम लि० (नेडफी)
  2. उत्तर-पूर्वी क्षेत्री कृषि विपणन निगम लि० (नेरामेक).
  3. उतर-पूर्वी हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम लि० आदि.
  4. उत्तर प्रदेश में हाल में संपन्न हुए चुनावों हेतु तैयार बी.जे.पी. के “लोककल्याण संकल्प पत्र” में कहा गया था कि पूर्वांचल में “पूर्वांचल विकास परिषद्” व बुंदेलखंड में “बुंदेलखंड विकास परिषद्” का गठन किया जाएगा. जिसे उत्तरप्रदेश के मुख्य मन्त्री ने अपनी पहली प्रेसकांफ्रेंस में कहा है कि वे सभी वायदे पूरे करेंगे. जहां उत्तरप्रदेश में राज्य के छोटे-छोटे भागों के उत्थान के लिए भी “विकास परिषदों” का गठन किया जा रहा है, इसी आधार पर उत्तराखंड में भी “हिमालय परिषद्” गठन के लिए भी व्यवस्था की जाय.

5- तिब्बत को जिस तरह चीन यातायात, संचार आदि से लैस कर रहा है, उसके समकक्ष उत्तराखण्ड सहित सम्पूर्ण हिमालयी क्षेत्र को साधन-संपन्न बनाया जाय :- महोदय, चीन अपनी दूरगामी योजना के तहत तिब्बत में 2020 तक 1300 कि०मि० रेल लाइन तथा एक लाख कि०मि० लम्बी सड़कों के निर्माण में जुटा है जिसमें बताते है कि वह अभी तक लगभग 130 लाख अमेरिकी डालर खर्च कर चुका है. वह आगे माउंट एवरेस्ट के नीचे सुरंगों से नेपाल-भूटान-भारत को जोड़ देगा जिससे हिमालयी क्षेत्र में चीन का आवागमन बढ़ जाएगा. जबकि भारत ने आजादी के बाद 2001 में लालकुंवा-रुद्रपुर के बीच मैदानी क्षेत्र में मात्र 24 कि०मि० रेल लाइन उत्तराखंड में बिछाई है. यही हाल देश के अन्य पहाड़ी राज्यों का भी है जो अब तक के शासकों की मूर्खतापूर्ण उदासीनता या लापरवाही को दर्शाता है.

अत: उत्तराखंड के परिपेक्ष में हमारे कर्णाधार/भाग्यविधाता कितने सम्बेदनशील थे इसीसे पता चलता है कि अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर बसे हजारों गाँव आज पलायन के चलते भूतिया गाँवों में तब्दील हो चुके हैं. उस क्षेत्र में यदि कोई समस्या आती है तो सरकार को यथासमय बताने वाला भी कोई नहीं है.

6- राज्य पुनर्गठन विधेयक-2000 में संसोधन कर हरिद्वार तथा उधमसिंहनगर जिलों को वापस उत्तर प्रदेश को लौटा कर उत्तराखण्ड को पर्वतीय राज्य का वास्तविक स्वरूप दिया जाय :- तत्कालीन सोच को ध्यान में रखते हुए कि “उधमसिंहनगर नैनीताल जिले में हमारे आनाज का कटोरा तथा हरिद्वार हमारी देवभूमि का दरवाजा” होने से इनका उत्तराखंड के अन्दर होना लाजमी है. लेकिन, वर्तमान में उत्तराखंड राज्य का जो स्वरूप बनाये रखा जाना चाहिए था वह हमारे कर्णाधारों/भाग्यविधाताओं की अदूरदर्शीता से छिन्न-भिन्न होता जा रहा है. पहाडिये तो पलायन को मजबूर हैं लेकिन इन क्षेत्रों में कौन कहाँ से आ कर कब बस रहा है, किसी का कोई सत्यापन नहीं हो रहा है, बहिर्गतों के लिए कोई कट-आफ सीमा लागू नहीं है, जनसँख्या घनत्व के चलते पहाड़ों से MLAs की सीटें भी घटती जा रही हैं. ऐसे में यदि पर्वतीय राज्य का वास्तविक स्वरूप बचाए रखने में सरकारें सक्षम नहीं हैं तो क्यों न राज्य पुनर्गठन विधेयक-2000 में संसोधन करके हरिद्वार तथा उधमसिंहनगर जिलों को वापस उत्तर प्रदेश को लौटा दिया जाय ताकि हमारी आगे की पीढ़ियों के लिए पर्वतीय राज्य का वास्तविक स्वरूप को अभी भी बचाया जा सकेगा?

7- उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्र की कृषि चौपट हो चुकी है. लोग सरकारी खाद्यान्न पर पूर्णत: निर्भर हैं. अत: पर्वतीय कृषि के उन्नयन हेतु धरातली योजनाओं का संचालन किया जाय :- जैसा सर्वविदित है कि निदेशालय उद्यान चौबटिया, रानीखेत में होते हुए भी पर्वतीय क्षेत्र के भूमिधर परम्परागत सूखी कृषि में ही उलझे रहे जिनकी पैदावार लागत सन 1985 में 52/- रूपये प्रति की०ग्रा० की दर तक बैठी हैं जो सर्वथा अलाभकारी रही हैं और पलायन के अनेक कारणों मे से मुख्य एक है. इसके उन्नयन हेतु कभी कोई प्रयास नहीं हुवे नतीजा पहाड़ में बचे लोग आज पूर्णत: सरकारी खाद्यान्न पर निर्भर हैं. जिसके लिए विखरे जोतों की भूमि व्यवस्था चकबंदी के द्वारा करके क्षेत्र विशेषों में संसाधनों के आधार पर व्यवसायिक कृषि-बागवानी-पशुपालन व उद्योगों के लिए धरातली योजनाओं का संचालन नितांत आवश्यक है ताकि पहाड़ के युवा जो महानगरो में होटल, फेक्ट्रियो, छोटी दुकानों में बहुत कम बेतन पर मुश्किल हालत में गुजारा कर रहे हैं. वे भी चकबंदी होते ही अपनी पुश्तेनी जमीन का सही उपयोग कर के घर-गाँवों में ही जीविका के साधन जुटाएंगे.

8- उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में “जोत चकबंदी एवं भूमि व्यवस्था विधेयक 2016” को लागू कराये जाने हेतु एक-दो गाँवों में चकबंदी के मॉडल तुरंत बनाए जाँय :- महोदय, उत्तराखंड चकबंदी विधेयक 2016 में पास होकर यह सरकारी गजट में भी प्रकाशित हो चुका है. इसकी नियमावली बना कर विभागीय ढ़ांचा खडा करते ही पूरे राज्य में जमीनों की बंदोबस्ती करके चकबंदी होनी है. किन्तु चकबंदी का यह प्रयोग हमारे पर्वतीय क्षेत्र के लिए नया होने के कारण इसके लिए पहले एक-दो मॉडल बनाए जाने आवश्यक समझे गए हैं. जिसके लिए ग्रामसभा झलोड़ी/रानीखेत, जनपद अल्मोड़ा के भूमिधरों ने स्वेच्छा से अपनी लगभग तीन-चार हजार नाली जमीन 2014 से ही देनी स्वीकारी है तथा इसके लिए उन्होंने 8 (आठ) बिंदु भी सुझाए हैं ताकि बंदोबस्ती/चकबंदी का यह कार्य निर्विवाद संपन्न हो. इस स्थल का जिलाधिकारी द्वारा भ्रमण किया गया है तथा स्थानीय प्रशासन ने भी भूमिधरों के सांथ बैठक करके अपनी रिपोर्ट शासन को भेजी है तथा उनकी देख-रेख में चकबंदी क्षेत्र का नक्शा, खसरा व मास्टरप्लान भी गाँव के युवाओं द्वारा तैयार किया जा चुका है जिसकी सम्पूर्ण रूप-रेखा अलग से प्रस्तुत की जा रही है.

अत: उक्त मॉडल को तुरंत बनाये जाने हेतु संबंधितों को आवश्यक दिशा निर्देश देकर इसी के अनुसार राज्य के अन्य जनपदों के गाँवों में भी स्वेच्छिक/अनिवार्य बंदोबस्ती/चकबंदी मास्टरप्लान के सांथ लागू कराकर उजड़ने की कगार पर पहुँच चुके हजारों गांवों के लाखों पलायित भूमिधरों को व्यवसायिक योजनाओं के द्वारा पुनर्स्थापित करके पहाड़ को जीवनदान दिया जाय.

महोदय, यह कार्य एक न एक दिन तो होना ही है, अत: समस्त उत्तराखंड वासियों की हार्दिक ईच्छा है कि आपके ही कार्यकाल में यह तुरंत संपन्न हो तथा उत्तराखंड के इतिहास के पन्नों में इसका श्रेय आपको मिले.

प्रार्थियों के नाम स्कैन कापी में देखें…

चकबंदी मंच टीम

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