✅ पोस्ट 1 – उत्तराखंड में भूमि सुरक्षा, चकबंदी और अनुच्छेद 371 पर बैठक – 15 मार्च 2017
बैठक का उद्देश्य:
उत्तराखंड की भूमि व्यवस्था, पर्वतीय कृषि संकट, पलायन, और राज्य की संवैधानिक सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श कर ठोस सुझाव तैयार करना।
बैठक का स्थान एवं मुख्य वक्ता:
दिनांक: 15 मार्च 2017
स्थान: गोविंदपुर गरवाल, हल्द्वानी (निवास स्थान – श्री केवला नन्द तेवाड़ी)
मुख्य आमंत्रित वक्ता: श्री श्याम सिंह रावत, निवासी – बिन्दुखत्ता, लालकुंवा
प्रमुख प्रतिभागी:
- श्री टी. एस. दानू
- श्री डी. एस. बुन्गला
- श्री बी. एस. धामी
- श्री जगदीश कांडपाल
- श्री डी. एस. कोटलिया
- श्री सुन्दर सिंह टाकुली
- श्री जी. बी. जोशी
- श्री ए. पी. मठपाल
- श्री ईश्वरीदत्त भट्ट
- श्री मयंक लोहनी
- श्री रविंदर सिंह
- श्री लीलाधर ब्रिजवासी
- श्री शेर सिंह बिष्ट
- श्री श्याम सिंह रावत
- श्री केवला नन्द तिवाड़ी
चर्चा का सारांश:
उत्तराखंड राज्य बनने के बावजूद स्वास्थ्य, शिक्षा, यातायात, संचार और रोजगार जैसी मूलभूत समस्याएँ जस की तस बनी हुई हैं।
पर्वतीय क्षेत्र में तेज़ी से पलायन हो रहा है।
खेत-खलिहान बंजर हो रहे हैं तथा ग्रामीण अपनी पैतृक भूमि तक की पहचान खो चुके हैं।
यह स्थिति उत्तराखंड की अस्मिता और अस्तित्व के लिए गंभीर चुनौती है।
सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव:
- संविधान का अनुच्छेद 371 अन्य हिमालयी राज्यों की तर्ज पर उत्तराखंड में लागू किया जाए।
- उत्तराखंड को आधिकारिक रूप से हिमालयी राज्यों की श्रेणी में सम्मिलित कर विशेष आर्थिक सहायता दी जाए।
- जल-जंगल-जमीन एवं जनजीवन संरक्षण हेतु हिमालय मंत्रालय की स्थापना।
- “हिमालय परिषद” का गठन कर केन्द्र सरकार में विशेष महत्व दिया जाए।
- चीन की तरह हिमालयी क्षेत्रों को संचार, यातायात एवं आधारभूत सुविधाओं से संपन्न किया जाए।
- राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 2000 में संशोधन कर हरिद्वार व ऊधमसिंहनगर जिलों को उत्तर प्रदेश में वापस किया जाए।
- पर्वतीय कृषि के पुनरुत्थान हेतु व्यावहारिक योजनाएँ बनाई जाएँ।
- पर्वतीय क्षेत्रों में चकबंदी लागू की जाए व चयनित गाँवों को मॉडल गाँव बनाया जाए।
अधिक जानकारी और शुभचिंतकों के कमेंट्स के लिए देखें
✅ पोस्ट 2 – मुख्यमंत्री को भेजा गया पत्र – उत्तराखंड को अनुच्छेद 371 के तहत संरक्षण देने की मांग
पत्र का सारांश:
15 मार्च 2017 की बैठक में लिए गए निर्णयों के आधार पर 6 अप्रैल 2017 को माननीय मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को एक पत्र प्रेषित किया गया। इस पत्र में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर बल दिया गया:
प्रमुख मांगें:
- संविधान का अनुच्छेद 371 और सैक्सन-18 को उत्तराखंड में लागू कर विशेष भूस्वामियों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करना।
- उत्तराखंड को देश के अन्य हिमालयी राज्यों के समान विशेष आर्थिक सहायता प्रदान की जाए।
- हिमालय क्षेत्र के जल-जंगल-जमीन एवं जन-जीवन संरक्षण हेतु विशेष मंत्रालय की स्थापना की जाए।
- पूर्वोत्तर परिषद की तर्ज पर “हिमालय परिषद” का गठन किया जाए।
- चीन द्वारा तिब्बत क्षेत्र में किये जा रहे विकास के समान हिमालय क्षेत्र को संचार, यातायात आदि से समृद्ध किया जाए।
- राज्य पुनर्गठन अधिनियम-2000 में संशोधन कर हरिद्वार और उधमसिंहनगर जिलों को उत्तर प्रदेश में वापस कर उत्तराखंड को पर्वतीय राज्य का स्वरूप दिया जाए।
पत्र की भावना:
राज्य गठन के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए यह पत्र संवैधानिक सुरक्षा और विशेष आर्थिक सहायता के महत्व को उजागर करता है।
प्रदेश के निवासियों के साथ-साथ भूतिया गांवों, पलायन व अन्य गंभीर समस्याओं पर भी जोर दिया गया।
पत्र की पूरी जानकारी और शुभचिंतकों के कमेन्ट भी इस लिंक देखें
सेवा में,
श्रीमान त्रिवेंद्र सिंह रावत
माननीय मुख्य मन्त्री
उत्तराखंड, देहरादून.
विषय :- उत्तराखंड को संबिधान के अनुच्छेद – 371 तथा सैक्सन – 18 के प्रावधानों के अंतर्गत संरक्षण प्रदान कराने बाबद प्रार्थना.
महोदय,
उत्तराखण्ड राज्य के नवें मुख्यमन्त्री के रूप में कार्यभार ग्रहण करने पर आपको बधाई एवं शुभकामनायें ! हम आशा करते हैं कि जिस उद्देश्य के लिए इस पहाड़ी राज्य का गठन किया गया था उसकी दशा एवं दिशा को आपके कार्यकाल में निश्चित रूप से एक सकारात्मक दिशा मिलेगी व राज्य विकास की ओर अग्रसर होगा.
महोदय, उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र की समस्याओं पर गत 15 मार्च, 2017 को हल्द्वानी में एक चर्चा आयोजित की गयी जिसमें वक्ताओं द्वारा अत्यंत दुख व्यक्त करते हुए कहा गया है कि प्रथक उत्तराखंड राज्य की मांग जिन कारणों से उठाई गयी थी, अलग राज्य गठन के बावजूद वे न केवल अब भी मौजूद हैं, बल्कि और भी अधिक पीड़ादायक और जटिल हो गयी हैं जिनमें,
– स्वास्थ-शिक्षा-व्यवसाय-यातायात-संचार जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में लोग अपने बसे-बसाए घर-गाँव छोड़ रहे हैं जिससे हजारों गाँव भूतिया गाँवों में तब्दील हो चुके है.
– जिन गाँवों में अभी भी कुछ लोग बचे हैं उनके पशु व बाल-बच्चे भी जंगली जानवरों की चपेट में आने से वे भी बहुत तेजी से गाँव छोड़कर जहां-तहां शहरों की झुग्गी-झोपड़ियों में दयनीय स्थितियों में भटकने लगे हैं. ऐसे में यदि किसी के बाल-बच्चे अपने घर-गाँव वापस जाना भी चाहते हैं तो उनके घर खँडहर व जमीन बंजर होने से उनको ये भी पता नहीं है कि उनके पूर्वजों के खेत कहाँ-कहाँ हैं तथा अब तो हजारों गाँवों की स्थिति ये हो गयी है कि गाँवों में उनसे आ बैठ कहने वाला भी कोई नहीं है.
– शहारों व कस्बों में भी स्कूली शिक्षा के बाद तकनीकि शिक्षाओं के अभाव में विद्यार्थियों को अपना भविष्य अंधकारमय होने की आशंका के डर से वे भी शहरों की ओर रुख करना शुरू करने लगते हैं जिससे हमारा युवावर्ग मैदानी भागों की शिक्षा के बाद उधर ही जीविका की गुजर बसर करने को मजबूर होता है.
यह सब हमारे राजनैतिक नेतृत्व, प्रशासक, बुद्धिजीवी तथा आन्दोलनकारी शक्तियों तथा चुनी हुई सरकारों के होते हुए हमारे ग्रामीणों के अलावा समस्त पहाड़ की अश्मिता एवं संप्रभुता के सांथ भी क्रूरतापूर्ण मजाक हो रहा है. इन सारी समस्याओं का पहाड़ के हित में तुरंत निदान हेतु, सर्वसम्मति से तय किया गया कि हमारी नयीं विधानसभा के सम्मुख निम्न बिन्दुओं को अबिलम्ब रखा जाय :-
1- बिधान के अनुच्छेद – 371 को देश के अन्य हिमालयी राज्यों की तर्ज पर उत्तराखण्ड राज्य में भी लागू कराते हुए सैक्सन – 18 के प्रावधानों को भी लागू कराया जाय :- महोदय, जैसा विदित है कि हमारा हिमालयी राज्य उत्तराखंड चीन के नियंत्रण वाले तिब्बत तथा नेपाल जैसी अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं से घिरा होने के बाबजूद यहाँ के निवासियों के लिए देश के अन्य सभी हिमालयी राज्यों की तरह कोई संबैधानिक संरक्षण की व्यवस्था नहीं की गयी है. अत: संबिधान के अनुच्छेद – 371 को उत्तराखंड राज्य के हित में सैक्सन – 18 के प्रावधानों को जैसाकि ये हिमाचल प्रदेश में लागू हैं, इसे यहाँ भी तुरंत लागू कराया जाय ताकि अन्य हिमालयी राज्यों की तरह यहाँ भी कोई बाहरी व्यक्ति जहां-तहां जमीन ना खरीदने सके जिसका सीधा व चिरस्थाई लाभ भूस्वामियों को मिले. इसके लिए तत्काल प्रभाव से एक बोर्ड का गठन किया जाय. जिसमें सरकारी उच्चाधिकारी, भूमि विशेषज्ञ व ग्राम पंचायतों आदि को भी अनुभव के आधार पर आवश्यकतानुसार शामिल किया जाय.
2- देश के सभी हिमालयी राज्यों में उत्तराखण्ड को भी सम्मिलित किया जाय एवं उनके समान आर्थिक सहायता प्रदान की जाय :- संबिधान के अनुच्छेद – 370 द्वारा जम्मू-कश्मीर के हितों की रक्षा की गयी है, जबकि अनुच्छेद- 371 के अंतर्गत पूर्वोत्तर के आठ राज्यों— सिक्किम, असम, मेघालय, अरुणाचल, नागालेंड, मणिपुर, मिजोराम और त्रिपुरा के सांथ-सांथ आंध्र प्रदेश तथा गोवा जैसे राज्यों के लिए भी इसी अनुच्छेद के तहत विशेष प्रावधानों में इन राज्यों के निवासियों को अनेक प्रकार की सुविधाओं के अलावा इनकी सभ्यता, संस्कृति तथा परम्पराओं को संरक्षण भी मिला हुवा है. हमारे पडौसी राज्य हिमाचल प्रदेश में भी ऐसे अनेक प्राविधान लागू हैं जिनका अतिक्रमण कोई बाहरी व्यक्ति नहीं कर सकता. अत: ऐसी सहायता उत्तराखंड को भी मिलनी चाहिए.
3- हिमालयी क्षेत्र के जल-जंगल-जमीन तथा जन-जीवन के संरक्षण-संवर्धन हेतु प्रथक मंत्रालय की स्थापना की जाय :- इस सम्बन्ध में भी पूर्वोत्तर के सामाजिक-आर्थिक विकास कार्यों के समुचित कार्यान्वयन हेतु “पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय” का गठन किया गया है जिसे “डोनर मंत्रालय” के नाम से जाना जाता है जो केन्द्रीय मंत्रालयों, विभागों, नीति-निर्माताओं और अन्य सम्बद्ध पक्षों के सम्मुख इस क्षेत्र के पैरोकार और समन्वयक का कार्य करता हुवा उनके विकास हेतु प्राथमिकताओं तथा जरूरतों के अनुसार योजनायें और परियोजनाएं बनाता व उनके नियोजन, कार्यान्वयन की निगरानी भी करते हुए उनकी वार्षिक और पंचवर्षीय योजनाओं की रूप-रेखा बनाने में मदद के अलावा उनके लिए वित्तीय प्रबंध भी करता है. इसी तर्ज पर पश्चिमी हिमालयी राज्यों (उत्तराखंड-हिमाचल व जम्मू-कश्मीर) के लिए भी “पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र विकास मंत्रालय” के गठन की व्यवस्था की जाय.
4- “पूर्वोत्तर परिषद्” की तर्ज पर “हिमालय परिषद्” का गठन किया जाय तथा केन्द्रीय मन्त्रीमंडल/ सरकार में हिमालयी क्षेत्र को विशेष महत्व प्रदान किया जाय :- विदित हो कि “पूर्वोत्तर परिषद्” का मुक्य कार्य क्षेत्रीय विकास की योजनायें बनाना, राज्य सरकारों व अन्य संस्थाओं की परियोजनाओं की देखरेख, निगरानी व इन्हें पूर्ण करना है. इस परिषद् ने पूर्वोत्तर विजन-2020 तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र के विकास के लिए भारत सरकार द्वारा कुछ अन्य संस्थाओं का भी गठन किया गया है जैसे-
- उत्तर-पूर्वी क्षेत्रीय वित्त विकास निगम लि० (नेडफी)
- उत्तर-पूर्वी क्षेत्री कृषि विपणन निगम लि० (नेरामेक).
- उतर-पूर्वी हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम लि० आदि.
- उत्तर प्रदेश में हाल में संपन्न हुए चुनावों हेतु तैयार बी.जे.पी. के “लोककल्याण संकल्प पत्र” में कहा गया था कि पूर्वांचल में “पूर्वांचल विकास परिषद्” व बुंदेलखंड में “बुंदेलखंड विकास परिषद्” का गठन किया जाएगा. जिसे उत्तरप्रदेश के मुख्य मन्त्री ने अपनी पहली प्रेसकांफ्रेंस में कहा है कि वे सभी वायदे पूरे करेंगे. जहां उत्तरप्रदेश में राज्य के छोटे-छोटे भागों के उत्थान के लिए भी “विकास परिषदों” का गठन किया जा रहा है, इसी आधार पर उत्तराखंड में भी “हिमालय परिषद्” गठन के लिए भी व्यवस्था की जाय.
5- तिब्बत को जिस तरह चीन यातायात, संचार आदि से लैस कर रहा है, उसके समकक्ष उत्तराखण्ड सहित सम्पूर्ण हिमालयी क्षेत्र को साधन-संपन्न बनाया जाय :- महोदय, चीन अपनी दूरगामी योजना के तहत तिब्बत में 2020 तक 1300 कि०मि० रेल लाइन तथा एक लाख कि०मि० लम्बी सड़कों के निर्माण में जुटा है जिसमें बताते है कि वह अभी तक लगभग 130 लाख अमेरिकी डालर खर्च कर चुका है. वह आगे माउंट एवरेस्ट के नीचे सुरंगों से नेपाल-भूटान-भारत को जोड़ देगा जिससे हिमालयी क्षेत्र में चीन का आवागमन बढ़ जाएगा. जबकि भारत ने आजादी के बाद 2001 में लालकुंवा-रुद्रपुर के बीच मैदानी क्षेत्र में मात्र 24 कि०मि० रेल लाइन उत्तराखंड में बिछाई है. यही हाल देश के अन्य पहाड़ी राज्यों का भी है जो अब तक के शासकों की मूर्खतापूर्ण उदासीनता या लापरवाही को दर्शाता है.
अत: उत्तराखंड के परिपेक्ष में हमारे कर्णाधार/भाग्यविधाता कितने सम्बेदनशील थे इसीसे पता चलता है कि अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर बसे हजारों गाँव आज पलायन के चलते भूतिया गाँवों में तब्दील हो चुके हैं. उस क्षेत्र में यदि कोई समस्या आती है तो सरकार को यथासमय बताने वाला भी कोई नहीं है.
6- राज्य पुनर्गठन विधेयक-2000 में संसोधन कर हरिद्वार तथा उधमसिंहनगर जिलों को वापस उत्तर प्रदेश को लौटा कर उत्तराखण्ड को पर्वतीय राज्य का वास्तविक स्वरूप दिया जाय :- तत्कालीन सोच को ध्यान में रखते हुए कि “उधमसिंहनगर नैनीताल जिले में हमारे आनाज का कटोरा तथा हरिद्वार हमारी देवभूमि का दरवाजा” होने से इनका उत्तराखंड के अन्दर होना लाजमी है. लेकिन, वर्तमान में उत्तराखंड राज्य का जो स्वरूप बनाये रखा जाना चाहिए था वह हमारे कर्णाधारों/भाग्यविधाताओं की अदूरदर्शीता से छिन्न-भिन्न होता जा रहा है. पहाडिये तो पलायन को मजबूर हैं लेकिन इन क्षेत्रों में कौन कहाँ से आ कर कब बस रहा है, किसी का कोई सत्यापन नहीं हो रहा है, बहिर्गतों के लिए कोई कट-आफ सीमा लागू नहीं है, जनसँख्या घनत्व के चलते पहाड़ों से MLAs की सीटें भी घटती जा रही हैं. ऐसे में यदि पर्वतीय राज्य का वास्तविक स्वरूप बचाए रखने में सरकारें सक्षम नहीं हैं तो क्यों न राज्य पुनर्गठन विधेयक-2000 में संसोधन करके हरिद्वार तथा उधमसिंहनगर जिलों को वापस उत्तर प्रदेश को लौटा दिया जाय ताकि हमारी आगे की पीढ़ियों के लिए पर्वतीय राज्य का वास्तविक स्वरूप को अभी भी बचाया जा सकेगा?
7- उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्र की कृषि चौपट हो चुकी है. लोग सरकारी खाद्यान्न पर पूर्णत: निर्भर हैं. अत: पर्वतीय कृषि के उन्नयन हेतु धरातली योजनाओं का संचालन किया जाय :- जैसा सर्वविदित है कि निदेशालय उद्यान चौबटिया, रानीखेत में होते हुए भी पर्वतीय क्षेत्र के भूमिधर परम्परागत सूखी कृषि में ही उलझे रहे जिनकी पैदावार लागत सन 1985 में 52/- रूपये प्रति की०ग्रा० की दर तक बैठी हैं जो सर्वथा अलाभकारी रही हैं और पलायन के अनेक कारणों मे से मुख्य एक है. इसके उन्नयन हेतु कभी कोई प्रयास नहीं हुवे नतीजा पहाड़ में बचे लोग आज पूर्णत: सरकारी खाद्यान्न पर निर्भर हैं. जिसके लिए विखरे जोतों की भूमि व्यवस्था चकबंदी के द्वारा करके क्षेत्र विशेषों में संसाधनों के आधार पर व्यवसायिक कृषि-बागवानी-पशुपालन व उद्योगों के लिए धरातली योजनाओं का संचालन नितांत आवश्यक है ताकि पहाड़ के युवा जो महानगरो में होटल, फेक्ट्रियो, छोटी दुकानों में बहुत कम बेतन पर मुश्किल हालत में गुजारा कर रहे हैं. वे भी चकबंदी होते ही अपनी पुश्तेनी जमीन का सही उपयोग कर के घर-गाँवों में ही जीविका के साधन जुटाएंगे.
8- उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में “जोत चकबंदी एवं भूमि व्यवस्था विधेयक 2016” को लागू कराये जाने हेतु एक-दो गाँवों में चकबंदी के मॉडल तुरंत बनाए जाँय :- महोदय, उत्तराखंड चकबंदी विधेयक 2016 में पास होकर यह सरकारी गजट में भी प्रकाशित हो चुका है. इसकी नियमावली बना कर विभागीय ढ़ांचा खडा करते ही पूरे राज्य में जमीनों की बंदोबस्ती करके चकबंदी होनी है. किन्तु चकबंदी का यह प्रयोग हमारे पर्वतीय क्षेत्र के लिए नया होने के कारण इसके लिए पहले एक-दो मॉडल बनाए जाने आवश्यक समझे गए हैं. जिसके लिए ग्रामसभा झलोड़ी/रानीखेत, जनपद अल्मोड़ा के भूमिधरों ने स्वेच्छा से अपनी लगभग तीन-चार हजार नाली जमीन 2014 से ही देनी स्वीकारी है तथा इसके लिए उन्होंने 8 (आठ) बिंदु भी सुझाए हैं ताकि बंदोबस्ती/चकबंदी का यह कार्य निर्विवाद संपन्न हो. इस स्थल का जिलाधिकारी द्वारा भ्रमण किया गया है तथा स्थानीय प्रशासन ने भी भूमिधरों के सांथ बैठक करके अपनी रिपोर्ट शासन को भेजी है तथा उनकी देख-रेख में चकबंदी क्षेत्र का नक्शा, खसरा व मास्टरप्लान भी गाँव के युवाओं द्वारा तैयार किया जा चुका है जिसकी सम्पूर्ण रूप-रेखा अलग से प्रस्तुत की जा रही है.
अत: उक्त मॉडल को तुरंत बनाये जाने हेतु संबंधितों को आवश्यक दिशा निर्देश देकर इसी के अनुसार राज्य के अन्य जनपदों के गाँवों में भी स्वेच्छिक/अनिवार्य बंदोबस्ती/चकबंदी मास्टरप्लान के सांथ लागू कराकर उजड़ने की कगार पर पहुँच चुके हजारों गांवों के लाखों पलायित भूमिधरों को व्यवसायिक योजनाओं के द्वारा पुनर्स्थापित करके पहाड़ को जीवनदान दिया जाय.
महोदय, यह कार्य एक न एक दिन तो होना ही है, अत: समस्त उत्तराखंड वासियों की हार्दिक ईच्छा है कि आपके ही कार्यकाल में यह तुरंत संपन्न हो तथा उत्तराखंड के इतिहास के पन्नों में इसका श्रेय आपको मिले.
प्रार्थियों के नाम स्कैन कापी में देखें…
चकबंदी मंच टीम















