जैसा पूर्व ब्लॉग से ज्ञात है कि “उत्तराखंड पर्वतीय क्षेत्र जोत चकबंदी एवं भूमि व्यवस्था विधेयक 2016” पास होने के बाद स्वैच्छिक चकबंदी हेतु वर्षों से तैयार अनेक गांवों में शासनादेशों के तहत सम्बन्धित अधिकारियों के भ्रमण/निरिक्षण होने के बाबजूद भी मूलनिवासियों की बिखरी कृषिभूमि की चकबंदी नहीं कराके 2018 में पूंजीपतियों के लिए नया भू क़ानून पास कर दिया गया… इसे देखकर मा० हाईकोर्ट की सरण जाने के अलावा हमारे पास और कोई भी विकल्प नही होने से जब अपने पहाड़ी वकीलों से सम्पर्क किया तो उन्होंने भी हाँ हाँ तो कहा किन्तु इसे मा० हाईकोर्ट में दायर नहीं किया जा सका तो मा० सुप्रीमकोर्ट में कार्यरत उन बाहरी राज्यों के वकीलों से सम्पर्क किया गया जहां चकबंदी हुई है. इसी बीच जब उन वकीलों के द्वारा 2020 में जनहित याचिका तैयार होने लगी तो मा० न्यायालय की फटकार से बचने के लिए सरकार ने आनन फानन में 2016 से पास वो चकबंदी विधेयक/एक्ट जिसे Blog-2 में दिया गया है, को लागू कराके “ उत्तराखंड पर्वतीय क्षेत्र जोत चकबंदी एवं भूमि व्यवस्था नियमावली 2020 “ भी कैविनेट से पास कर दी तथा पहाड़ में चकबंदी का कार्य करने के लिए राजस्व विभाग को ही दायित्व दे दिया गया है.

लेकिन फिर भी किसी भी गाँव में धरातल पर जब कार्य नहीं हुवा तो अंतत: नवम्बर 2020 में सुप्रीमकोर्ट के वकीलों द्वारा तैयार उक्त जनहित याचिका 2 जनप्रतिनिधियों (विधायक रानीखेत तथा कृषि-उद्यान मंत्री उत्तराखंड) तथा 6 अधिकारियों (मुख्य सचिव उख०, राजस्व सचिव उख०, जिलाधिकारी अल्मोड़ा, मुख्य विकास अधिकारी अल्मोड़ा, उप जिलाधिकारी रानीखेत एवं तहसीलदार रानीखेत) को नामित करते हुए मा० हाईकोर्ट नैनीताल में दायर होते ही संबंधितों को नोटिस जारी हुए जिन्हें तत्कालीन समाचारोंयुक्त इन links
6-11-20 चकबंदी के लिए नैनीताल हाईकोर्ट में जनहित याचिका
25-11-20 चकबंदी के लिए नैनीताल हाईकोर्ट में सुनवाई शुरू हुई… न्यायालय का आभार!
23-12-20 पहाड़ी किसानों के हित में चकबंदी हेतु न्यायालय की एतिहासिक पहल
23-12-20 Times of India… Agri minister & Ranikhet MLA sent notices over ‘non-implementation’ of Uttarakhand Hills Consolidation of Holdings and Land Reforms Act
24-12-20 चकबंदी हेतु माननीयों को नोटिस जारी
27-12-20 नैनीताल माननीय उच्च न्यायालय ने 3 सप्ताह मे राज्य सरकार, कृषि मंत्री, कृषि सचिव, एंव रानीखेत विधायक से पर्वतीय इलाको मे बिखरी खेती पर चकबन्दी लागू कराने हेतु जबाव माँगा है लेकिन संबंधितों को उपरोक्त नोटिस जारी होने के उपरांत 2021 में सरकार की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में यह स्वीकारने के बाद भी कि रानीखेत के झलोड़ी गाँव के स्वैच्छिक चकबंदी के प्रस्ताव को बोर्ड आफ रेवन्यू भेज दिया गया था किन्तु इसके बाद इन बीते वर्षों में भी आगे कोई कार्यवाही नहीं हुई… link पर देखें. तथा जिलाधिकारी अल्मोड़ा की ओर से सभी उप जिलाधारियों को शासनादेश भी निर्गत हुवे हैं कि उक्त चकबंदी नियमावली 2020 में उल्लिखित नियमों/प्रावधानों के अंतर्गत गाँवों में चकबंदी की कार्यवाही करना सुनिश्चित करें. इस शासनादेश की फोटो भी देखें जिसे जानबूझकर अस्पष्ट ही प्रेषित किया गया है ताकि कहने को हो गया कि हमने तो शासनादेश भी जारी कर दिए थे.

लेकिन शासन-प्रशासन चकबंदी के लिए अब हमारे सहखातेदारों का बिरोध दिखाकर तथा मामला न्यायालय में विचाराधीन है कहकर चकबंदी को रोक रहा है जबकि इन्हीं खेतों को बेचते वक्त किसी भी सहखातेदार का हक़ दिखाकर चुपके छुपके बिकवा देने का ये दोहरा चरित्र क्यों? धोखे से बेचे गये खेतों के मालिक अब न्यायालयों के चक्कर लगाने को भी मजबूर हैं Link
इसलिए अब ग्रामीणों द्वारा निर्णय लिए जा रहे हैं कि वे आपसी सहमति से अपने खेतों को परस्पर अदल बदलकर खुद ही अपने अपने चक बनाये तथा इन चकों के अंदर आ रहे खेतों को पुराने गोलखातों से निकालकर आगे के लिए चकस्वामी के व्यक्तिगत नाम पर कराए जाने हेतु अपनी तहसीलों को आवेदन करें ताकि खेत व्यक्तिगत नाम पर होने से फिर इन्हें बिना लिखित अनुमति के कोई दूसरा बेचने नहीं सकेगा.
ज्ञात हों, चकबंदी एक्ट के नियमों/प्रावधानों के अंतर्गत कास्तकारों के बिखरे खेतों को इकट्ठा चकों में कराने की भूमिधरों को कोई रजिस्ट्री फीस नहीं देनी होती, यह सुविधा निशुल्क दी जाती है. जबकि सामान्य प्रक्रिया के तहत खेतों को खरीदकर इकट्ठा चकों में करने हेतु प्रतिनाली कम से कम 20000/- (बीस हजार) रूपये रजिस्ट्री फ़ीस देनी होती है. यदि खेत सड़क, स्कूल, स्वास्थ केंद्र आदि की सुविधायुक्त स्थान पर अथवा इसके नजदीक हो तो रजिस्ट्री फ़ीस/सर्कल रेट भी उसीनुसार और भी ज्यादा होते हैं.

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