हमारी चुनी हुई सरकारें भावी पीढ़ियों को कहाँ पहुंचाएंगी.

हमारी चुनी हुई सरकारें भावी पीढ़ियों को कहाँ पहुंचाएंगी.

9th पोस्ट (पार्ट- I) ….1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…….. (गतांक 19-2-2019 की 8th पोस्ट से आगे)….इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें

मित्रों,

उत्तरखंड पर्वतीय क्षेत्र के ग्रामीण भूमिधरों को उनके पूर्वजों के विखरे खेतों की कुल भूमि अन्य पर्वतीय राज्यों की भाँती मूलभूत सुविधाओं के सांथ चकों में मिलनी चाहिए. इससे बंदरों, सुवरों आदि से फसलों की सुरक्षा आसान होने पर दीर्घकालीन रोजगारपरक व्यवसायिक खेती के आर्थिक लाभों को देख कर गाँवों से पलायन कर चुके लोग स्वत: वापस आने के लिए प्रेरित होंगे जिससे गाँवों में आवादी बढने पर शिक्षा, स्वास्थचिकित्सा, व्यवसाय, जल-जंगल-जमीन, गैर उत्तराखंडियों की घुस-पैठ, गैरसैण राजधानी जैसे अनेक मुद्दों में जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी भी स्वत: सुनिश्चित होगी !!!

लेकिन सरकार भूमिबंदोबस्ती-चकबंदी के इस अहम मुद्दे को 1985 से किसी ना किसी बहाने टालते आई है… इस सम्बन्ध का एक लम्बा पत्राचार 1985 से 2014 तक जो अरुणाचल प्रदेश प्रवास के दौरान चला, उसे इससे पहले की 8 पोस्टों में क्रमवार दिया गया है. इधर 2014 के बाद का पत्राचार भी आप सभी पहाड़ प्रेमी एवं चकबंदी शुभचिंतकों की जानकारी के लिए आगे की पोस्टों में भी क्रमवार दिया जाना है ताकि भूमि सम्बन्धी मुहिम मजबूत बन कर हमारी भावी पीढियों/बाल-बच्चों को उनके पूर्वजों के जल-जंगल-जमीनों आदि की सही जानकारी होकर खाते-खतौनियों में उनके विखरे खेतों की कृषिभूमि चकों में व्यवस्थित हो, जो भविष्य के लिए उनका एक स्थायी पता भी होगा !!! वर्ना, हम जमीन-जायदाद वालों को 1985 से चिल्लाने के बाद भी, जब वर्तमान में ही, स्लम्स में बंजारों का जैसा जीवन जीने को मजबूर किया जाने लगा है, तो कल्पना करके देखिये कि डिमोक्रेसी के नाम पर चुनी जा रही ये सरकारें हमारी भावी पीढ़ियों को कहाँ पहुंचाएंगी ??? (स्लम्स में रहते हैं पलायन करने वाले अधिकतर उत्तराखंडी… समाचार की कटिंग पृष्ट 184 भी देखें).

इसीलिए, हमारा स्पष्ट मानना है कि भूमिधरों की कुल भूमि जब तक उन्हें मूलभूत सुविधाओं के सांथ चकों में नहीं मिलेंगी तो बंदरों, सुवरों व बाघों का आतंक में कोई भी परिवार विखरे खेतों में कैसे खेती करेगा तथा किसके सहारे गांवों में रहेगा? पलायन का यही मुख्य कारण हैं; जिससे खेत बंजर, घर खंडर तथा हजारों गाँव भूतिया हो कर पहाड़ में शिक्षा-स्वास्थ-व्यवसाय आदि भी बर्बाद है… तो फिर ये तथाकथित जनप्रतिनिधियों की सरकार पलायन रोकने के नाम पर करोड़ों-अरबों की योजनायें व कमेटियाँ, समीतियाँ तथा आयोग के बजट को एक बार अपने ही भूमिधर वोटरों की पुस्तैनी भूमि को व्यवस्थित करने के लिए भी क्यों खर्च नहीं करना चाहते…???

अत: जो-जो गाँव चकबंदी के लिए तैयार हैं उनमें सरकार भूमिबंदोबस्ती-चकबंदी भू-प्रबंधन के सांथ मॉडल के तौर पर तुरंत कराए.कृपया, 2014 से 2016 तक का एक लम्बा पत्राचार जिसे संशिप्त रूप में 64 पृष्ठों के द्वारा वर्तमान सरकार के अस्तित्व में आते ही मार्च 2017 में मा० मुख्यमंत्री जी को दिया गया है. स्थानाभाव के कारण इस पोस्ट में मात्र 42 पत्रों को 120 to 161 में देखें तथा बांकी 22 पत्रों को 162 to 184 में इसी 9th पोस्ट के पार्ट-II में देखें :- क्रमश:

केवला नन्द “फ़कीर”

जनपद अल्मोड़ा एवं पौड़ी में चकबंदी कार्यालय हेतु शासनादेश

जनपद अल्मोड़ा एवं पौड़ी में चकबंदी कार्यालय हेतु शासनादेश

8th पोस्ट… 18 फ़रवरी 2019……1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से….इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें

मित्रों,

अरुणाचल प्रदेश में 1975 से 2014 तक नौकरी करते हुए अपने घर-गाँव व पहाड़ के ग्रामीण परिवेश में उपलब्ध संसाधनों के उचित संवर्धन एवं दोहन से विश्व प्रशिद्ध देवभूमि उत्तराखंड को और भी गौरवशाली बनाने में भूमिधरों की कृषिजन्य पारम्परिक दैनिक कार्यकुशालाताओं को उनके विखरे खेतों की भूमिबंदोबस्ती एवं चकबंदी (भूमि व्यवस्थित) कराकर जो नितांत आवश्यक है, ऐसा समझकर संबंधितों के सांथ जो भी पत्राचार संभव हुवा, आप सभी पाठकों के सम्मुख 7 पोस्टों में संक्षिप्त रूप से प्रस्तुत करते हुए मुझे हर्ष है कि आप लोगों ने इन्हें गैर से पढ़ कर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं भी दी हैं जो देर-सबेर एक दिन इन सब के लिए जुम्मेदार लोगों को सोचने पर मजबूर करेंगे.

उधर जैसा 3rd पोस्ट (19-12-2018) में बताया गया है कि ग्रामसभा झलोड़ी (रानीखेत) की 200 हे० भूमि को महिलाओं की योजनानुसार चकबंदी के द्वारा विकसित कराने के लिए अध्यक्ष राजस्व परिषद उत्तर प्रदेश, लखनऊ की 27-9-1989 की बैठक के निर्णयोंनुसार पत्र दि० 7-6-1990 के क्रम में जनपद अल्मोड़ा एवं पौड़ी में 1991 से चकबंदी कार्यालय भी खोले गये थे !!! लखनऊ के पत्रों की फोटो देखें.

चकबंदी कार्यालय खुलते ही इन जनपदों के भूमिधर ने अपने आवाद खेतों में खेती करना भी इस आशा से छोड़ दिया कि उनकी कुल जमीन अब एक सांथ चकों में मिलेगी !!! लेकिन 7-8 वर्षों बाद पता चला कि उप्र० चकबंदी एक्ट 1953 यहाँ की पर्वतीय भौगोलिक स्थितियों के लिए सही नहीं है, अत: पर्वतीय क्षेत्र के लिए अलग एक्ट होने पर ही यहाँ चकबंदी होगी कह कर उन कार्यालयों को बंद करा दिया गया… जो भूमिधरों का दुर्भाग्य रहा !!! नतीजा, इन दोनों जनपदों के ग्रामीण भूमिधर अन्य जनपदों के मुकाबले पूरे बर्बाद हुए जिससे यहाँ पलायन भी अधिक हुवा है? इस पर हम आगे चर्चा करेंगे…

इधर, 2000 में प्रथक राज्य बनते ही “ पर्वतीय क्षेत्र चकबंदी एक्ट “ के लिए हर सरकार ने अपनी-अपनी कमेटियाँ/समीतियाँ बना-बना कर नाना प्रकार के आश्वासन व घोषणाएं कर-कर के अपने ही भूमिधर वोटरों को इस भ्रम में भी रखते रहे कि मानो अब चकबंदी होने ही वाली है… और अपना-अपना पांच-पांच वर्षों का कार्यकाल बारी-बारी निकालते रहे…

उपरोक्त पत्रों के सांथ “पहाड़ों की उपयोगिता बागवानी-चकबंदी भाग- I तथा II ” भी संलग्न- पत्र संख्या 99 to 119 में देखें. क्रमश:

केवला नन्द “फकीर”

विभागों की मनमानी व न्यायिक जांच के आदेश

विभागों की मनमानी व न्यायिक जांच के आदेश

5th post…14 जनवरी’ 2019  (विभागों की मनमानी व न्यायिक जांच के आदेश) 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें :

मित्रों,

इस सम्बन्ध के कुछ उपलब्ध पत्र-प्रपत्रों का एक लम्बा पत्राचर जो मेरे अरुणाचल प्रदेश में सेवारत रहते हुए 1985 से उत्तर प्रदेश की सरकारों के सांथ चला तथा अभी सेवानिवृत होने के बाद अपनी उत्तराखंड की सरकारों के सांथ भी लगातार चलता ही आ रहा है, इसे क्रम वार यहाँ देने का प्रयास किया जा रहा है जो इस पर्वतीय क्षेत्र के प्रति जुम्मेदार सरकारों की सम्बेद्नाओं को दर्शाते है… कृपया इस सम्बन्ध के यदि किसी अन्य के पास भी कोई पत्रादि हों तो उन्हें भी साझा करें तथा सभी शुभचिंतकों से भी आग्रह है कि वे भी अपने सुझाव दें ताकि सरकारों की गलत नीतियों के कारण भूमिधरों को मालिक से मजबूरी में मजदूर होने से रोकने के लिए न्यायालय में पहल की जा सके.

जैसा 4th पोस्ट से विदित है कि “कास्तकार महिलाओं की योजना” को क्रियान्वयन हेतु 17 हेक्टर यानि 850 नाली भूमि का एक टुकडा भूमि संरक्षण विभाग को दिया गया किन्तु देखते ही देखते योजना के नाम पर रुपयों को ठिकाने लगाने की मुहिम ऐसी तेज हुई कि कास्तकारों की भूमि दूर-दूर छोटे-छोटे टुकड़ों में विखरी होने के कारण अधिकारियों व कर्मचारियों ने मनमानी करके उक्त योजना की ऐसे-तैसी कर दी.

कास्तकारों की परिषद् एवं खेती का कार्य कर रही महिला मंडलों के साथ विचार-विमर्श किये बगैर ही, जैसा कि योजनानुसार सीटू विधि से स्वयं की बीजू पौंध उचित दूरी पर विधिवत तैयार गड्डों में उगाकर उन्हें बिना उखाड़े वहीं पर कलमी बनाकर पालने की कीमत कास्तकारों को ही दी जानी थी, ताकि वे योजना के दूसरे चरण पर काम करते लेकिन अधिकारियों ने योजना के विपरीत आपा-धापी में मैदानी क्षेत्रों की नर्सरियों से आम, नीबूं, अमरूद आदि की हजारों बीजू पौंधों को लाकर नैपाली मजदूरों द्वारा वहां की बलुई-दोमट मिटटी में बिना सिचाई व्यवस्था के जहां-तहां रोपण करा कर धनराशि का दुरूपयोग किया जाने लगा.

दूसरी ओर, कास्तकारों की 25-30 वर्ष पुरानी सींचाई व्यवस्था जो गर्मियों में गधेरे की पानी की क्षमतानुसार पतली गूल से हो रही थी उसकी थोड़ी-बहुत मरम्मत के बजाय उसे जड़ से ही उखाड़ कर, कास्तकारों के मना करने के बाबजूद भी, रुपयों को खपाने के लिए जबरदस्ती नहर रुपी नयी गूल का निर्माण करा दिया. इससे बरसात के भयंकर पानी से कास्तकारों के अनेक सीढ़ीदार खेत बह गये. खेतों में जहाँ-तहां कटाव व भूस्खलन से अनेक अप्रत्यासित नुकसान होगये. (पटवारी की रिपोर्ट देखें). इनसे कास्तकार महिलाओं की भावनाओं को बहुत बड़ी ठेस पहुंची क्योंकि वे ही इस योजना की मुख्य सूत्रधार थी और सरकार से बहुत बड़ी आशा लगाये हुए थी !!!

लेकिन, इसे देख कास्तकारों का रोष जब न्यायालय की शरण लेने को बाध्य होने लगा तो शासन द्वारा कार्य को बंद कराते हुए उक्त भूमि संरक्षण विभाग को पूरे पर्वतीय क्षेत्र में बैन कर दिया गया. इस प्रकरण का एक लम्बा पत्राचार मौजूद है जिसके कुछ ही पत्रों को यहाँ पर दिया जा रहा है. (भूमि संरक्षण विभाग की मनमानी, SDM, DM आदि को पत्र, समाचारों की कटिंग्स व न्यायिक जांच हेतु प्रार्थना आदि क्रमवार संलग्न- 42 to 73 देखें). क्रमश: …

केवला नन्द “फकीर”

बागवानी योजना एवं धनराशि हेतु मा० मंत्रीजी को ज्ञापन

बागवानी योजना एवं धनराशि हेतु मा० मंत्रीजी को ज्ञापन

5 दिसम्बर’ 17 (योजना एवं धनराशि हेतु मा० मंत्रीजी को ज्ञापन) बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…. इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.

बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें :-

2nd पोस्ट 5-12-2017

मित्रों,

जैसा आपने इसके पहले 17 नवम्बर की 1st पोस्ट में देखा कि हमारी परम्परागत खेती में रवि फसलों की पैदावार लागत सन 1985 में 52/- रूपये प्रति किग्रा० की दर तक बैठने के कारण हमने निदेशालय उद्यान से प्रार्थना कि थी कि वे हमारी ग्रामसभा की पूरी भूमि को समन्वित बागवानी योजना के तहत चकों में विकसित कराएँ ताकि कास्तकारों को उनकी पैदावारों से आर्थिक लाभ मिले. जिसके लिए 26 जुलाय 1988 को भेजे गये हमारे पत्र के प्रतिउत्तर में निदेशालय उद्यान से DHO को एवं DHO से ADO को जो पत्र भेजे थे उनकी फोटो भी आपने देखी हैं.

लेकिन खेद है कि निदेशालय में अनेक तकनीकि विशेषज्ञों के होते हुए भी उन्होंने कष्टमय कृषि कार्य कर रही ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक उत्थान के लिए कोई भी ठोस योजना नहीं दी. अंतत: बाध्य होकर भूमिधरों ने “ग्राम विकास परिषद्” नाम कि अपनी पंजीकृत संस्था के माध्यम से खुद योजना बनाई जिसे,

1a-d– ग्रामसभा की पूरी भूमि के लिए समन्वित बागवानी हेतु 2070210/- (बीस लाख सत्तर हजार दो सौ दस रुपयों) की 14 प्रष्ठों की एक योजना दि० 8 फरवरी 1989 में निदेशालय को सौंपी. जिसमें 1a से 1d तक मुख्य योजना व मोवाइल यूनिट का डिटेल मात्र यहाँ पर दिया जा रहा है. आवश्यक होने पर अन्यों का डिटेल भी दिया जाएगा.

2a-b– इसके क्रम में 8 फरवरी 89 को ही निदेशालय उद्यान द्वारा सहायक आयुक्त एवं संबंधितों को पत्र भेजे गए.

3- पुन: निदेशालय उद्यान के पत्र के क्रम में DHO अल्मोड़ा ने अपने पत्र दि० 6 अप्रेल 89 के द्वारा अध्यक्ष परिषद, मुझे एवं अन्यों को सलाह दी कि हम उक्त योजना के लिए किसी व्यवसायिक बैंक से लोन ले लें.

4a-b– इस पर 28 अप्रेल 89 के पत्र द्वारा स्पष्ट किया गया कि लोन लेकर भूमिधरों/कास्तकारों को दोहरी समस्याओं में उल्झाने के बजाय पर्वतीय क्षेत्र के विकास हेतु सरकारों द्वारा चलाई जा रही नाना प्रकार की योजनाओं के अंतर्गत किसी एक योजना के तहत इस क्षेत्र को भी उक्त योजनाबद्ध तरीकों से विकसित किया जाय.

5a-b– अध्यक्ष ग्राम विकास परिषद् द्वारा दि० 18 जून 89 को मा० मुख्य मन्त्री उत्तरप्रदेश को भी पत्र दिया गया कि राज्य अथवा केंद्र सरकार की ओर से इस योजना के लिए बजट दिलाया जाय.

6a-b– इधर क्षेत्रीय ग्रामप्रधानों, जनप्रतिनिधियों, गणमान्यों आदि ने भी उक्त योजनानुसार क्षेत्र की अन्य 15 ग्रामसभाओं में भी इस योजना को तुरंत लागू कराने हेतु तत्कालीन वरिष्ट उपाध्यक्ष, पर्वतीय विकास परिषद, उत्तरप्रदेश, श्रीमान गोविन्द सिंह महरा जी, कैम्प रानीखेत को भी 9 सितम्बर 89 को एक ज्ञापन दिया.

7a-d– इसके तुरंत बाद 5 दिसम्बर 89 को परिषद की बैठक में ग्रामसभा के प्रत्येक गाँव के लिए महिला मंडल कि अध्यक्षाओं का मनोनयन कर उनके द्वारा 14 दिसम्बर के पत्र से SDM रानीखेत को संबोधित करते हुए अध्यक्ष पर्वतीय विकास परिषद उ०प्र० एवं अन्य संबंधितों को भी आग्रह किया गया कि क्षेत्र को फल-पट्टी के रूप में विकसित किया जाय. कृपया इन सभी पत्रों की फोटो भी देखें. सम्बंधितों की प्रतिक्रियायें अगली पोस्ट पर….. धन्यवाद.

केवला नन्द “फ़कीर”

7351026532

उत्तराखंड पर्वतीय क्षेत्र में बिखरी कृषिभूमि की चकबंदी हेतु अरुणाचल प्रवास समय के पत्र-तथ्य.

उत्तराखंड पर्वतीय क्षेत्र में बिखरी कृषिभूमि की चकबंदी हेतु अरुणाचल प्रवास समय के पत्र-तथ्य.

उत्तराखंड का पर्वतीय क्षेत्र मानवता के लिए एक बरदान है जिसे मैंने उत्तराखंड से बाहर रह कर समझा. 1974 में देश
के पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश के कृषि-उद्यान विभाग में नियुक्त हुवा. विभाग के आदेशोंनुसार वहां के लिए फल-
पौंधे तथा नर्सरियों के लिए माली, बागवानों के लिए मधुमक्खियों के बक्से आदि आदि हेतु उद्यान निदेशालय
चौबटिया, रानीखेत मेरा आना जाना लगातार चलता रहा. इसबीच, यहाँ के फल-पौधों से अरुणाचल के किसानों की
दिन प्रति दिन सुधरती आर्थिक स्थितियों के मुकाबले हमारे पहाड़ के किसान 52/- रूपये प्रति किग्रा० की दर तक
बैठने वाली कृषि फसलों को ही लेने को मजबूर हैं…? यद्यपि, जागरूक किसानों का एक समूह सितोष्ण पौधशालाओं
के लिए सक्रिय था किन्तु इसकी भी 1984 में सेव में स्कैव नामक की बिमारी ने कमर ही तोड़ दी…?
ऐसी बिडम्बनाओं को देखकर पहाड़ के किसानों के बिखरे खेतों को पहले चकबंदी की प्रक्रिया के द्वारा इकट्ठा कराने
की सोच बनी. यों भी चकबंदी देश के विभन्न राज्यों में 1920 से लागू है तथा हमारे पडौसी राज्य हिमाचल प्रदेश ने
भी 1971 में पंजाब से पृथक राज्य मिलते ही इस चकबंदी की प्रक्रिया को पहले अपनाया. इसी प्रक्रिया के द्वारा यहाँ,
पहाड़ के किसानों के बिखरे खेतों को भी इकट्ठा कराने की जो कोशीस की गई वह आज 40 वर्षों बाद भी जारी है.
यद्यपि मा० हाईकोर्ट से संबंधितों को नोटिस जाते ही सरकार ने 2020-21 से चकबंदी कराने के आदेश दे दिए हैं तथा
हमारी जनहित याचिका के क्रम में सरकार की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में भी यह स्वीकारा है कि
रानीखेत के झलोड़ी गाँव के स्वैच्छिक चकबंदी के प्रस्ताव को बोर्ड आफ रेवन्यू भेज दिया गया था किन्तु इसके बाद
भी इन बीते वर्षों में आगे कोई कार्यवाही नहीं होना चकबंदी की प्रक्रिया में आने वाले अवरोध प्राकृतिक कम साजिशों
से भरे ज्यादा होने से शासन-प्रशासन एवं अन्यों की मंशा पर भी प्रश्न चिन्ह लगाते हैं?
इस सम्बन्ध के कुछ मुख्य पत्र-तथ्य जो मेरे अरुणाचल प्रवास के दौरान हुवे उन्हें फेसबुक पर क्रमवार 14 पोस्टों
में दिया गया है. इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में
फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.
केवला नन्द तेवाड़ी

चकबंदी मंच उत्तराखंड

मित्रो,
दैनिक जागरण 16 नम्बर, 2017 का समाचार शीर्षक “ कुमाऊं का चकबंदी गाँव बनेगा झलोड़ी ” उसमें 1985 से चले आ रहे
प्रयासों का जिक्र किया गया है जिससे तबकि फाइलों के पन्नों को देखने से लगता है कि “उत्तराखंड में चकबंदी आवश्यक क्यों?”
यह कल-परसों की कोई अचानक उपजी सोच नहीं है.
इस बारे में जल-जंगल जमीनों से जुड़े पौड़ी निवासी 81 वर्ष के बयोब्रद्ध आ० गणेश गरीब जी जैसे अनेक व्यक्तियों का मानना
है कि देश के अन्य पहाड़ी राज्यों की तरह सरकारों ने हमारे पूर्वजों के विखरे खेतों की कुल भूमि जिसकी जितनी है उतनी एक
सांथ चकों में अगर तभी दे दी होती तो निश्चय ही भूमिधर एक ही स्थान पर पूर्ण मनोयोग से कृषिजन्य कार्यों को अपनी

आर्थिकी का मुख्य श्रोत बनाकर अन्य बाहरी श्रोतों से होने वाली आय जैसे नौकरी-पेसा व सरकारी अनुदान आदि से गाँवों को
औद्योगिकरण की ओर लेजाते जिससे आज के यही गाँव शहरों में परिवर्तित हो रहे होते.
जबकि विकास के नाम पर सरकारी स्तरों से जो भी प्रयास हुए वे सब सोने के अन्डे देने वाली मुर्गी का हलाल करके रातों रात
मालामाल होने की होड़ में इस देव भूमि की आत्मा माने जाने वाले समृद्ध गाँवों को ही ऐसा लील गया कि आज हमारे हजारों
गाँव भूतिया गाँवों में तब्दील हो चुके हैं और हम खुद जमीन जायदाद वाले होकर भी खाना-बदोसों का जैसा जीवन जीने को
मजबूर हैं. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी आज इसकी पुष्टि करता है.
मित्रों, इस सम्बन्ध में ऐसा नहीं कि हम तब चुप थे, मेरा इन बीते 43 वर्षों (1974-2017) का व्यक्तिगत अनुभव आधारित कुछ
पत्राचार जो पुरानी फाइलों में पड़ा है, उसे यहाँ संक्षिप्त में देखिये कि :-

  • मैं 1974 में अरुणाचल प्रदेश (तब लोग उसे नेफा के नाम से जानते थे) के कृषि-उद्यान विभाग में नियुक्त हुवा. वहां की
    आबो-हवा व भौगोलिक परिस्थितियां हमारे उत्तराखंड जैसी ही होने के कारण वहाँ बागवानी विकास हेतु यहाँ चौबटिया, रानीखेत
    तथा हिमाचल व जम्मू-कश्मीर से प्रति वर्ष लाखों फल-पौंधों को लेजाकर वहां की हजारों हेक्टर भूमि में नाना प्रकार के फलों की
    पट्टियाँ तथा अनेकों पौधशालायें तैयार की गयी. वहां पर आज ठन्डे इलाकों में सेव व अखरोट ने अच्छी पकड़ बना ली है तथा
    कीवी फल की पैदावार विदेशी आयात को टक्कर देने की स्थिति में आ रही है. निचले इलाकों में संतरा, अन्नानास ने अच्छी
    पकड़ बनाई है तथा बड़ी इलायची 600/- 700/- रु० किलो के हिसाब से व्यापारी खेतों से पैदावार उठाकर सीधे अरब की बाजारों में
    निर्यात कर रहे हैं. इसे अगर ठीक से समझा जाय तो 2014 तक, अकेले बागवानी से 25-30 से 60-70 लाख रु० तक प्रतिवर्ष की
    आय लेने वाले अनेक किसान अरुणाचल में मौजूद हैं. बड़ी इलायची को बढ़ावा देने में सिक्किम राज्य का काफी योगदान है.
    कुल मिलाकर बागवानी विकास उस क्षेत्र में आम जन-समुदाय की आर्थिकी का केंद्र बनता जा रहा है.
  • जबकि यहाँ हमारे उत्तराखंड में भारत की आजादी (1947) के तुरंत बाद से ही उ०प्र० के इस पर्वतीय क्षेत्र (उत्तराखण्ड) की आबो-
    हवा में बागवानी विकास की अपार सम्भावनाओं को ध्यान में रख कर उद्यान एवं फल संस्करण के सांथ-सांथ अनुसंधान हेतु
    भी चौबटिया (रानीखेत) में निदेशालय उद्यान की स्थापना की गई थी. लेकिन यह आश्चर्य ही है कि चकबंदी के अभाव में हमारे
    कास्तकार अपने दूर-दूर विखरे खेतों में हल-बैल लेकर जुताई,
    बुवाई, देख-रेख हेतु आने-जाने में समय, श्रम व मजदूरी देकर 1985 में भी 52/- रूपये प्रति किग्रा० की दर तक बैठने वाली
    परम्परागत कृषि पैदावारें ही लेने को बाध्य थे. जो आज की परिस्थितियों में सैकड़ों रूपये प्रति किग्रा० हो गयी होंगी. हमने इन
    आकड़ों के आधार पर तभी 1985 में उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप व्यवसायिक सहकारी कृषि-बागवानी को चकबंदी के तौर पर
    देश के अन्य पहाड़ी राज्यों की भाँती तत्कालीन उत्तर प्रदेश के इस पर्वतीय क्षेत्र में भी अपनाने की पुरजोर पहल की जो आज
    2017 में भी जारी है.
    इस सम्बन्ध में 1985 से ही निदेशालय उद्यान एवं संबंधितों को मेरे द्वारा अरुणाचल प्रदेश से लिखे गए पत्रों में से कुछों को
    सिलसिलेवार यहाँ दिया जा रहा है जिनमें दि० 26 जुलाय 1988 के पत्र के प्रतिउत्तर में निदेशालय उद्यान से DHO को एवं DHO
    से ADO को पत्रों की फोटो भी देखें. सम्बंधितों की प्रतिक्रियायें अगली पोस्ट पर….. धन्यवाद.
    केवल नन्द “फकीर”
    7351026532
उत्तराखंड पहाड़ में अपनी कृषिभूमि को कैसे बचायें और बढायें ?

उत्तराखंड पहाड़ में अपनी कृषिभूमि को कैसे बचायें और बढायें ?

इसके लिए पहले भूमिबंदोबस्त एवं चकबंदी इन दोनों प्रक्रियाओं को ठीक से समझना होगा

 

भूमिबंदोबस्त वह प्रक्रिया है जिसमें परिवार बढने के साथ साथ कृषि-बागवानी की उपज भी बढाये जाने हेतु नये खेतों का निर्माण किया जाता है. तथा रिकार्ड रखने के लिए प्रत्येक परिवार के प्रत्येक खेत को एक एक नम्बर देकर उनके कुल खेतों को एक संयुक्त खाता के अंतर्गत लेकर इन खेतों का रिकार्ड राजस्व विभाग के पास सुरक्षित रहता है. इस खाते को गोलखाता के नाम से भी जाना जाता है जिसके अंतर्गत के प्रत्येक खेत में परिवार के सभी सदस्यों का सहखातेदारी के तौर पर बराबर का हिस्सा होता है.

     उत्तराखंड के पहाड़ों में भी खेत बनाने हेतु हमारे पूर्वजों को कृषि-बागवानी-पशुपालन आदि के लिए जहां भी जल-जंगल-जमीन की सुविधा मिली उन्होंने पहाड़ काट काट कर सीढ़ीदार खेत बनाये और उनमें पोषक तत्वोंयुक्त मिटटी को भी संरक्षित किया ताकि फसलों की अच्छी पैदावारें हो.

     जैसा रिकार्डों में उपलब्ध है, हमारे पहाड़ में अंग्रेजों के समय 11 भूमिबंदोबस्त हुवे. उन्होंने पहला भूमिबंदोबस्त 1815-16 में किया तथा अंतिम 11वां 1928 में हुवा. इसके बाद भारत सरकार द्वारा 12वां भूमिबंदोबस्त 1960-62 में हुवा. लेकिन इसके बाद पहाड़ में भूमिबंदोबस्त की इस प्रक्रिया को रोक कर नए खेत बनाने बंद कर दिए गये. जबकि राज्य के तराई-भाबर व अन्य मैदानी क्षेत्रों में यह प्रक्रिया निरंतर चल रही है… तो ये दोहरा माप-दंड, सिर्फ उत्तराखंड के पहाड़ के लिए ही क्यों? क्या यह भूमाफियाओं की कोई साजिस तो नहीं, जिसे जनता एवं सरकारों को भी समझना होगा.

 

 

 

  पहाड़ में 1960-62 की भूमिबंदोबस्ती के रिकार्डों को देखने से प्रत्येक परिवार के पास तब लगभग 100 नाली कृषिभूमि थी जो इन बीते वर्षों में, यानि 2023-24 तक दो-तीन भूमिबंदोबस्त और हो जाने चाहिए थे जिससे गाँवों में प्रत्येक किसानों के पास आज कम से कम 60-70 नाली (एक नाली = 2000 वर्गफुट/ 1 एकड़ = 20 नाली/ 1 हे० = 50 नाली) भूमि होती तो निश्चित ही कृषिजन्य कार्यों के सहारे लोग गाँवों में रहते तो संयुक्त परिवार भी कायम रहते जिससे आवादी बढने से स्वास्थ चिकित्सा, शिक्षा, पशुपालन, मौनपालन आदि अनेक और उद्योग भी पनप रहे होते तो मूलनिवास-भूकानून-रोजगार जैसी अनेकों समस्याओं का भी स्वत: ही निदान हो रहा होता! किन्तु जैसा दिख रहा है, भूमिबन्दोबस्त रोककर नये खेत नहीं बनने से परिवारों के बढने के अनुपात में वही लगभग 100 नाली भूमि अब परिवार के प्रत्येक सदस्य के पास घटकर 2-4 नाली भी नही रह जाने से जहां उन्हें रोजगार की तलास में गाँवों से दूसरे राज्यों की ओर पलायन के लिए मजबूर कराके हजारों गांवों को जनविहीन होने दिया गया है वहीं पुनर्विकास के नाम पर करोड़ों/अरबों की योजनाओं को ठिकाने लगाते हुवे पूंजीपतियों को 12.5 एकड़+ यानि 250 नाली से भी अधिक भूमि एक साथ चकों में देने के लिए 2018 में इन्वेस्ट समिट के नाम से नया भूकानून भी लागू कर दिया… जो एक साजिस भरी मंसा भी हो सकती है कि पहाड़ के मूलनिवासी किसानों को इस भूमि से बंचित ही रखकर धीरे धीरे पूंजीपतियों की झोली में डाल दिया जाय तथा इसके रिकार्ड आगे 13वां भूमिबंदोबस्त के नाम से भी जाने जा सकते हैं

 

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