8th पोस्ट… 18 फ़रवरी 2019……1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से….इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें
मित्रों,
अरुणाचल प्रदेश में 1975 से 2014 तक नौकरी करते हुए अपने घर-गाँव व पहाड़ के ग्रामीण परिवेश में उपलब्ध संसाधनों के उचित संवर्धन एवं दोहन से विश्व प्रशिद्ध देवभूमि उत्तराखंड को और भी गौरवशाली बनाने में भूमिधरों की कृषिजन्य पारम्परिक दैनिक कार्यकुशालाताओं को उनके विखरे खेतों की भूमिबंदोबस्ती एवं चकबंदी (भूमि व्यवस्थित) कराकर जो नितांत आवश्यक है, ऐसा समझकर संबंधितों के सांथ जो भी पत्राचार संभव हुवा, आप सभी पाठकों के सम्मुख 7 पोस्टों में संक्षिप्त रूप से प्रस्तुत करते हुए मुझे हर्ष है कि आप लोगों ने इन्हें गैर से पढ़ कर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं भी दी हैं जो देर-सबेर एक दिन इन सब के लिए जुम्मेदार लोगों को सोचने पर मजबूर करेंगे.
उधर जैसा 3rd पोस्ट (19-12-2018) में बताया गया है कि ग्रामसभा झलोड़ी (रानीखेत) की 200 हे० भूमि को महिलाओं की योजनानुसार चकबंदी के द्वारा विकसित कराने के लिए अध्यक्ष राजस्व परिषद उत्तर प्रदेश, लखनऊ की 27-9-1989 की बैठक के निर्णयोंनुसार पत्र दि० 7-6-1990 के क्रम में जनपद अल्मोड़ा एवं पौड़ी में 1991 से चकबंदी कार्यालय भी खोले गये थे !!! लखनऊ के पत्रों की फोटो देखें.
चकबंदी कार्यालय खुलते ही इन जनपदों के भूमिधर ने अपने आवाद खेतों में खेती करना भी इस आशा से छोड़ दिया कि उनकी कुल जमीन अब एक सांथ चकों में मिलेगी !!! लेकिन 7-8 वर्षों बाद पता चला कि उप्र० चकबंदी एक्ट 1953 यहाँ की पर्वतीय भौगोलिक स्थितियों के लिए सही नहीं है, अत: पर्वतीय क्षेत्र के लिए अलग एक्ट होने पर ही यहाँ चकबंदी होगी कह कर उन कार्यालयों को बंद करा दिया गया… जो भूमिधरों का दुर्भाग्य रहा !!! नतीजा, इन दोनों जनपदों के ग्रामीण भूमिधर अन्य जनपदों के मुकाबले पूरे बर्बाद हुए जिससे यहाँ पलायन भी अधिक हुवा है? इस पर हम आगे चर्चा करेंगे…
इधर, 2000 में प्रथक राज्य बनते ही “ पर्वतीय क्षेत्र चकबंदी एक्ट “ के लिए हर सरकार ने अपनी-अपनी कमेटियाँ/समीतियाँ बना-बना कर नाना प्रकार के आश्वासन व घोषणाएं कर-कर के अपने ही भूमिधर वोटरों को इस भ्रम में भी रखते रहे कि मानो अब चकबंदी होने ही वाली है… और अपना-अपना पांच-पांच वर्षों का कार्यकाल बारी-बारी निकालते रहे…
उपरोक्त पत्रों के सांथ “पहाड़ों की उपयोगिता बागवानी-चकबंदी भाग- I तथा II ” भी संलग्न- पत्र संख्या 99 to 119 में देखें. क्रमश:
7th पोस्ट… 29 जनवरी 2019 (चकबंदी हेतु कब कब, क्या क्या हुवा) 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से….इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें
मित्रों,
जैसा 20 जनवरी 2019 की 6th post से स्पष्ट है कि तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने पर्वतीय ग्रामीण क्षेत्र की आर्थिकी के लिए आजादी के बाद से ही न तो कोई टिकाऊ योजना दी, न कास्तकारों द्वारा खुद उगाये-पाले-पोषे गये फल-पौंधों की लागत मेहनत ही उनको दी और न उनके विखरे खेतों की बंदोबस्ती-चकबंदी करने के आदेशों का पालन हुवा. यही स्थितियां स्वास्थ, शिक्षा, व्यवसाय आदि क्षेत्रों में भी थी जिन्हें अनेक कर्मठ एवं जुझारू लोगों ने अपनी जान की बाजी लगाकर, शहादतें देकर अंतत: 2000 में पृथक राज्य की अवधारणा को साकार किया !!!
इधर पृथक राज्य उत्तराखंड बनने के बाद आशायें थी कि हमारे पडौसी राज्य हिमांचल प्रदेश की तर्ज पर यहाँ भी भूमिबंदोबस्ती-चकबंदी करके गाँवों से ही अर्थव्यवस्था के सांथ-सांथ स्वास्थ, शिक्षा एवं व्यवसायिक आयामों को भी सुद्रढ़ किया जायेगा. लेकिन हमारे जनप्रतिनिधियों ने गांवों के विकास की रीढ़ “चकबंदी” के नाम पर कब-कब क्या-क्या किया ये भी देखें :-
1- 2001-2002 – अपनी उत्तराखंडी सरकार, भाजपा के शासन में चकबंदी का निर्णय लिया गया तथा चकबंदी का प्रारूप बनाने के लिए हाईपावर कमेटी भी गठित की गई जिसमें गणेश सिंह “गरीब” जी को भी इसका सदस्य बनाया गया था, लेकिन काम नहीं हुवा.
2- 2004 – श्री नारायण दत्त तिवारी जी की सरकार में भी श्री पूरन सिंह डंगवाल जी की अध्यक्षता में भूमि सुधार परिषद का गठन हुवा. इस दौरान ताडीखेत ब्लाक की सगनेटी न्याय पंचायत तथा कल्जीखाल ब्लाक की दिवई न्याय पंचायत में अनेक बैठकें करके कार्यवाही को आगे बढ़ाने के प्रयास किये गए किन्तु फिर भी प्रारूप को अंतिम रूप नहीं दिया गया.
3- 2009 – इधर भी तत्कालीन मा० कृषि-उद्यान मंत्री श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत जी (वर्तमान मा० मुख्यमंत्री जी) की अध्यक्षता में पुन: सलाहकार समिति बनाई गई उसमें भी दिखावे की खाना पूर्ती करके लाखों रुपयों को स्वाहा: किया गया, किन्तु यहाँ भी काम कुछ नहीं हुवा.
4- 2012 – इस समय में भूमिधरों का दबाव तेज होने के कारण मुख्य मन्त्री श्री विजय बहुगुणा जी द्वारा अनिवार्य चकबंदी का निर्णय लिया गया तथा 3 (तीन) मन्त्रियों की एक कमेटी भी बनाई गई किन्तु तब भी कुछ नहीं हुवा.
तो क्या हमारी पृथक राज्य की अवधारणा यही थी ???
(हार्टिकल्चर टेक्नोलॉजी मिशन पर मा० मुख्यमंत्री श्री नारायण दत्त तिवारी जी को पत्र, वर्तमान मा० मुख्यमंत्री जी द्वारा तत्कालीन मा० कृषि-उद्यान मंत्री के समय के कुछ पत्र-तथ्य आदि संलग्न… 90 to 98 देखें) क्रमश: ……
6th post… 20 जनवरी’ 2019 (एक अनुरोध, कास्तकारों की 10 हे० की फल-पट्टी आदि हेतु) 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें
मित्रों,
यह पत्राचार जो मेरे अरुणाचल प्रदेश में नौकरी करते हुए उत्तर प्रदेश की सरकारों के सांथ चला तथा अभी सेवानिवृत होने के बाद अपनी उत्तराखंड की सरकारों के सांथ भी लगातार चलता ही आ रहा है, इसे क्रम वार यहाँ देने का प्रयास किया जा रहा है जो इस पर्वतीय क्षेत्र के प्रति जुम्मेदार लोगों की सम्बेद्नाओं को दर्शाते है… कृपया इस सम्बन्ध के किसी अन्य के पास भी अगर कोई पत्रादि हों तो उन्हें भी साझा करते हुए अपने सुझाव भी दें…
जैसा पूर्व पोस्टों से स्पष्ट है कि जहॉ ग्रामीणों के विखरे खेतों की पैदावार लागतें रु० 52/- प्रति किग्रा० बैठ रही हों, विभागाधिकारियों/कर्मचारियों द्वारा पहाड़ों के अनुकूल योजनाये बनाने की बात तो छोड़ ही दीजिये बल्कि “ महिलाओं की अपनी योजना “ में स्वीकृत धनराशि को भी ठिकाने लगाने की होड़ मची हो, ग्रामीणों की भावनाओं से खिलवाड़ हो रहा हो, गाँवों की विकट परिस्थितियों में जीवन यापन को लेकर जहॉ-तहॉ हाहाकार मचा हो तो स्वाभाविक है कि जागरूक लोग आखिर कब तक चुप रहेंगे? किस-किस का भरोसा करेंगे व किस-किस के आगे गिडगिडायेंगे? जबकि पहाड़ों के अनुकूल उनकी अपनी भी अनेक तकनीकिपूर्ण दिनचर्याऐं है जिन्हें सरकार के सहयोग से एक प्रोजेक्ट के रूप में उठाया जाना था वह भी भूमिधरों के पारिश्रमिक के बदले में सिर्फ आधी कीमत पर !!! किन्तु सरकार की कार्यप्रणाली से क्षुब्ध होकर कास्तकार महिलाओं ने 1993 में ‘‘ एक अनुरोध पत्र ‘‘ के द्वारा निर्णय लिया कि वे “ अपनी ही योजनानुसार “ स्वयं सीटू विधि द्वारा बगीचे तैयार करें.
देखते ही देखते 2-3 वर्षों में अनेक गाँवों में सीटू विधि से 10-10 हे० की फल-पट्टियों में लगभग 7000 पौंधे तैयार हो गये !!! जिनकी सूचना समय-समय पर शासन-प्रशासन को देते रहने के बाद भी कास्तकार महिलाओं को न तो इन पोंधों की कीमत दी गयी और न इन फल-पट्टियों की तकनीकी देख-रेख ही सुनिश्चित की गयी. 1997 में इस बाबद तत्कालीन ग्रामप्रधान द्वारा सत्यापित प्रार्थना पत्र को भी यों ही नजर अंदाज कर दिया गया जो हमारा दुर्भाग्य ही रहा कि 2001-02 तक हमारी इन सभी फल-पट्टियों की पौंधे कीड़े-विमारियों व तकनीकी देख-रेख के अभाव में धीरे-धीरे बर्वाद हो गई…
जबकि 1988-89 के अदेशोंनुसार चकबंदी के लिए खोले गये आफिसों के द्वारा इन गाँवों में भूमिबंदोबस्ती चकबंदी भी हो जानी चाहिए थी !!! इधर सरकार के चकबंदी आफिसों के भरोसे अल्मोड़ा व पौड़ी जिलों के अधिकतर भूमिधरों ने अपने आवाद खेत भी इस भरोसे से छोड़ दिए कि उन्हें अब जमीन चकों में मिल जायेगी… लेकिन, खेत बंजर व घर खंडर होते-होते लाखों कास्तकार मालिक से मजदूर बनने को विवस होकर गाँव छोड़ते चले गये …. जो आज भी बदस्तूर जारी है.
इस दुःख को हम किस सरकार के आगे रोयें ???
(एक अनुरोध, कास्तकारों की निजी पौंधों का बिवरण, 10 हे० की एक फल-पट्टी आदि संलग्न पत्र – 74 to 89 देखें) क्रमश: ….
5th post…14 जनवरी’ 2019 (विभागों की मनमानी व न्यायिक जांच के आदेश) 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें :
मित्रों,
इस सम्बन्ध के कुछ उपलब्ध पत्र-प्रपत्रों का एक लम्बा पत्राचर जो मेरे अरुणाचल प्रदेश में सेवारत रहते हुए 1985 से उत्तर प्रदेश की सरकारों के सांथ चला तथा अभी सेवानिवृत होने के बाद अपनी उत्तराखंड की सरकारों के सांथ भी लगातार चलता ही आ रहा है, इसे क्रम वार यहाँ देने का प्रयास किया जा रहा है जो इस पर्वतीय क्षेत्र के प्रति जुम्मेदार सरकारों की सम्बेद्नाओं को दर्शाते है… कृपया इस सम्बन्ध के यदि किसी अन्य के पास भी कोई पत्रादि हों तो उन्हें भी साझा करें तथा सभी शुभचिंतकों से भी आग्रह है कि वे भी अपने सुझाव दें ताकि सरकारों की गलत नीतियों के कारण भूमिधरों को मालिक से मजबूरी में मजदूर होने से रोकने के लिए न्यायालय में पहल की जा सके.
जैसा 4th पोस्ट से विदित है कि “कास्तकार महिलाओं की योजना” को क्रियान्वयन हेतु 17 हेक्टर यानि 850 नाली भूमि का एक टुकडा भूमि संरक्षण विभाग को दिया गया किन्तु देखते ही देखते योजना के नाम पर रुपयों को ठिकाने लगाने की मुहिम ऐसी तेज हुई कि कास्तकारों की भूमि दूर-दूर छोटे-छोटे टुकड़ों में विखरी होने के कारण अधिकारियों व कर्मचारियों ने मनमानी करके उक्त योजना की ऐसे-तैसी कर दी.
कास्तकारों की परिषद् एवं खेती का कार्य कर रही महिला मंडलों के साथ विचार-विमर्श किये बगैर ही, जैसा कि योजनानुसार सीटू विधि से स्वयं की बीजू पौंध उचित दूरी पर विधिवत तैयार गड्डों में उगाकर उन्हें बिना उखाड़े वहीं पर कलमी बनाकर पालने की कीमत कास्तकारों को ही दी जानी थी, ताकि वे योजना के दूसरे चरण पर काम करते लेकिन अधिकारियों ने योजना के विपरीत आपा-धापी में मैदानी क्षेत्रों की नर्सरियों से आम, नीबूं, अमरूद आदि की हजारों बीजू पौंधों को लाकर नैपाली मजदूरों द्वारा वहां की बलुई-दोमट मिटटी में बिना सिचाई व्यवस्था के जहां-तहां रोपण करा कर धनराशि का दुरूपयोग किया जाने लगा.
दूसरी ओर, कास्तकारों की 25-30 वर्ष पुरानी सींचाई व्यवस्था जो गर्मियों में गधेरे की पानी की क्षमतानुसार पतली गूल से हो रही थी उसकी थोड़ी-बहुत मरम्मत के बजाय उसे जड़ से ही उखाड़ कर, कास्तकारों के मना करने के बाबजूद भी, रुपयों को खपाने के लिए जबरदस्ती नहर रुपी नयी गूल का निर्माण करा दिया. इससे बरसात के भयंकर पानी से कास्तकारों के अनेक सीढ़ीदार खेत बह गये. खेतों में जहाँ-तहां कटाव व भूस्खलन से अनेक अप्रत्यासित नुकसान होगये. (पटवारी की रिपोर्ट देखें). इनसे कास्तकार महिलाओं की भावनाओं को बहुत बड़ी ठेस पहुंची क्योंकि वे ही इस योजना की मुख्य सूत्रधार थी और सरकार से बहुत बड़ी आशा लगाये हुए थी !!!
लेकिन, इसे देख कास्तकारों का रोष जब न्यायालय की शरण लेने को बाध्य होने लगा तो शासन द्वारा कार्य को बंद कराते हुए उक्त भूमि संरक्षण विभाग को पूरे पर्वतीय क्षेत्र में बैन कर दिया गया. इस प्रकरण का एक लम्बा पत्राचार मौजूद है जिसके कुछ ही पत्रों को यहाँ पर दिया जा रहा है. (भूमि संरक्षण विभाग की मनमानी, SDM, DM आदि को पत्र, समाचारों की कटिंग्स व न्यायिक जांच हेतु प्रार्थना आदि क्रमवार संलग्न- 42 to 73 देखें). क्रमश: …
4rth post 9January2019… 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें :
मित्रों,
इस सम्बन्ध के कुछ उपलब्ध पत्र-प्रपत्रों का एक लम्बा पत्राचर जो 1985 से उत्तर प्रदेश की सरकारों के सांथ चला तथा अभी अपनी उत्तराखंडी सरकारों के सांथ भी लगातार चलता ही आ रहा है, इसे क्रम वार यहाँ देने का प्रयास किया जा रहा है जो इस पर्वतीय क्षेत्र के प्रति इनकी सम्बेद्नाओं को दर्शाते है… कृपया इस सम्बन्ध में अपने सुझाव भी साझा करें …
जैसा 3rd पोस्ट से विदित है कि “कास्तकार महिलाओं की योजना– “बीजू फल-पौधों को in-situ विधि से यथास्थान पर बिना उखाड़े उन्हें कलमी बनाया जाने, इन पौंधों की कीमत मय गड्डे-खाद-पानी एवं रख-रखाव आदि मेहनत के बदले उन्हें सब्जियां, दालें, मसाले, औषधीय पौंध आदि उपलब्ध कराई जाने हेतु उक्त योजना भूमि संरक्षण विभाग को सौंपी गई.
यद्यपि, इसे उद्यान विभाग द्वारा क्रियान्वित किया जाना चाहिए था जिन्होंने योजना की बारीकियों को समझा था. लेकिन, भूमि संरक्षण विभाग को भी योजना की सारी तकनीकियाँ समझाते हुए इस योजना को एक मॉडल के रूप में विकसित करने हेतु झलोड़ी ग्रामसभा की खिरखेत नामक स्थान से लगी सड़क किनारे की 17 हे० भूमि विधिवत कोर्ट स्टाम्प पर कास्तकारों के हस्ताक्षरों के सांथ इस आशय से दी गई की योजनान्तर्गत के सारे कार्य कास्तकार स्वयं करेंगे जिनके बदले में उन्हें योजना के दूसरे चरण की पैदावारों को जो मुख्य फलपौंधों के बीच की खाली भूमि में लेने हेतु आवश्यक सामंग्रियाँ (बीज,खाद,दवाइयाँ आदि) उपलब्ध कराई जायेंगी. इस सम्बन्ध की 28 पृष्ठों की एक विस्तृत पत्रावली क्षेत्रीय पटवारी द्वारा SDM रानीखेत को दी गई तथा तत्कालीन ब्लाक प्रमुख को भी योजनानुसार कार्य संपन्न कराए जाने हेतु पत्र दिया गया. (संलग्न- कोर्ट स्टाम्प पर भूमिधरों की सहमति आदि के सांथ पटवारी द्वारा SDM को तथा ब्लाकप्रमुख को वस्तुस्थियों से अवगत कराते पत्रादि 34 to 41 देखें). क्रमश: …
केवला नन्द “फ़कीर”
(Note- 1st 2nd तथा 3rd पोस्टों को भी दि० 19-11-2017, 5-12- 2017 तथा 19-12-2018 में देखें ताकि वस्तुस्थितियां स्पष्ट होती जाय)
3rd post 19 दिसम्बर 2018 बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से….इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें :
मित्रों,
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में कृषिभूमि की सही व्यवस्था (बंदोबस्ती-चकबंदी) न होने से भूमिधरों का पलायन ऐसा बढ़ा कि गाँवों में खेत बंजर, घर खंडर व बानर-सुवर-बाघों का आतंक तथा शिक्षा-स्वास्थचिकित्सा-व्यवसाय चरमराने से हजारों गाँव भूतिया हो चुके हैं… अत: पहाड़ विकास के लिए,
कृषिभूमि की चकबंदी तुरंत कराए सरकार नहीं तो न्यायालय के लिए हो जाओ तैयार…
जैसा 2nd पोस्ट के पत्रों से स्पष्ट है कि “कास्तकार महिलाओं की अपनी योजना” को जनपद अल्मोड़ा के ताडीखेत ब्लाक की अन्य ग्रामसभाओं में भी तुरंत लागू कराये जाने हेतु क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों व गणमान्यों का एक शिष्टमंडल दल तत्कालीन मा० पर्वतीय विकास मंत्री उ०प्र०, श्रीमान गोविन्द सिंह महरा जी के रानीखेत निवास पर 9-9-1989 को एक ज्ञापन के सांथ मिला. योजना जो महिलाओं की दिनचर्याओं पर आधारित थी, चर्चा के दौरान यह स्पष्ट हुवा कि भूमिधरों को उनके विखरे खेतों की कुल भूमि एक सांथ चकों में मिलते ही यह योजना बागवानी के क्षेत्र में अवश्य ही क्रांतिकारी परिवर्तन लाएगी जैसा कि निदेशक उद्यान ने भी अपने पत्र में कहा है. इस पर मा० मंत्री जी ने प्रशन्नता व्यक्त करते हुए आश्वासन दिया कि भूमिबंदोबस्ती-चकबंदी के लिए वे स्वयं लखनऊ से तुरंत कार्यवाही करायेंगे. (इस पर लखनऊ में 27-9-1989 को राजस्व परिषद तथा चकबंदी विभाग उ०प्र० की बैठक हुई जिसमें अल्मोड़ा व पौड़ी में चकबंदी के कार्यालय खोलने का निर्णय हुवा….. इस पर आगे चर्चा करेंगे).
माननीय के सांथ इस बैठक में यह भी तय हुवा कि “भूमिबंदोबस्ती-चकबंदी होने तक झलोड़ी गाँव में इस योजना का एक मॉडल सूखा राहत योजना Dry Proon Area Programe (DPAP) के तहत तैयार किया जाय”. जिसके लिए पुन: अध्यक्ष, ग्राम विकास परिषद, खिरखेत द्वारा निदेशक उद्यान को प्रार्थना की गई जिस पर उनके द्वारा जिलाधिकारी से आग्रह किया गया कि उक्त कार्य को DPAP के तहत संपादित कराया जाय.
तत्पश्चात स्थानीय उपायुक्त रानीखेत से प्रार्थना की गई जिसके चलते उन्होंने एक निचित दिन में अपने ही कार्यालय में जिलाधिकारी अल्मोड़ा के सांथ हमारी बैठक कराई जिसमें उन्होंने भी “कास्तकार महिलाओं की योजना” की बारीकियों को समझते हुए कि “फल-पौधों को in-situ विधि से यानि यथास्थान पर बीजू पौंधों को बिना उखाड़े उन्हें कलमी बनाया जायेगा, इन पौंधों की कीमत मय गड्डे-खाद-पानी एवं रख-रखाव आदि की मेहनत के बदले उन्हें सब्जियां, दालें, मसाले, औषधीय पौंध आदि उपलब्ध कराई जायेगी”, उक्त योजना को DPAP के तहत क्रियान्वयन हेतु भूमि संरक्षण विभाग को सौंपा. (संलग्न- अध्यक्ष परिषद, निदेशक उद्यान, SDM, DM को पत्रादि क्रमवार 26 to 33 देखें).