जनपद अल्मोड़ा एवं पौड़ी में चकबंदी कार्यालय हेतु शासनादेश

Written by chakbandi

August 1, 2024

8th पोस्ट… 18 फ़रवरी 2019……1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से….इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें

मित्रों,

अरुणाचल प्रदेश में 1975 से 2014 तक नौकरी करते हुए अपने घर-गाँव व पहाड़ के ग्रामीण परिवेश में उपलब्ध संसाधनों के उचित संवर्धन एवं दोहन से विश्व प्रशिद्ध देवभूमि उत्तराखंड को और भी गौरवशाली बनाने में भूमिधरों की कृषिजन्य पारम्परिक दैनिक कार्यकुशालाताओं को उनके विखरे खेतों की भूमिबंदोबस्ती एवं चकबंदी (भूमि व्यवस्थित) कराकर जो नितांत आवश्यक है, ऐसा समझकर संबंधितों के सांथ जो भी पत्राचार संभव हुवा, आप सभी पाठकों के सम्मुख 7 पोस्टों में संक्षिप्त रूप से प्रस्तुत करते हुए मुझे हर्ष है कि आप लोगों ने इन्हें गैर से पढ़ कर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं भी दी हैं जो देर-सबेर एक दिन इन सब के लिए जुम्मेदार लोगों को सोचने पर मजबूर करेंगे.

उधर जैसा 3rd पोस्ट (19-12-2018) में बताया गया है कि ग्रामसभा झलोड़ी (रानीखेत) की 200 हे० भूमि को महिलाओं की योजनानुसार चकबंदी के द्वारा विकसित कराने के लिए अध्यक्ष राजस्व परिषद उत्तर प्रदेश, लखनऊ की 27-9-1989 की बैठक के निर्णयोंनुसार पत्र दि० 7-6-1990 के क्रम में जनपद अल्मोड़ा एवं पौड़ी में 1991 से चकबंदी कार्यालय भी खोले गये थे !!! लखनऊ के पत्रों की फोटो देखें.

चकबंदी कार्यालय खुलते ही इन जनपदों के भूमिधर ने अपने आवाद खेतों में खेती करना भी इस आशा से छोड़ दिया कि उनकी कुल जमीन अब एक सांथ चकों में मिलेगी !!! लेकिन 7-8 वर्षों बाद पता चला कि उप्र० चकबंदी एक्ट 1953 यहाँ की पर्वतीय भौगोलिक स्थितियों के लिए सही नहीं है, अत: पर्वतीय क्षेत्र के लिए अलग एक्ट होने पर ही यहाँ चकबंदी होगी कह कर उन कार्यालयों को बंद करा दिया गया… जो भूमिधरों का दुर्भाग्य रहा !!! नतीजा, इन दोनों जनपदों के ग्रामीण भूमिधर अन्य जनपदों के मुकाबले पूरे बर्बाद हुए जिससे यहाँ पलायन भी अधिक हुवा है? इस पर हम आगे चर्चा करेंगे…

इधर, 2000 में प्रथक राज्य बनते ही “ पर्वतीय क्षेत्र चकबंदी एक्ट “ के लिए हर सरकार ने अपनी-अपनी कमेटियाँ/समीतियाँ बना-बना कर नाना प्रकार के आश्वासन व घोषणाएं कर-कर के अपने ही भूमिधर वोटरों को इस भ्रम में भी रखते रहे कि मानो अब चकबंदी होने ही वाली है… और अपना-अपना पांच-पांच वर्षों का कार्यकाल बारी-बारी निकालते रहे…

उपरोक्त पत्रों के सांथ “पहाड़ों की उपयोगिता बागवानी-चकबंदी भाग- I तथा II ” भी संलग्न- पत्र संख्या 99 to 119 में देखें. क्रमश:

केवला नन्द “फकीर”

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