रानीखेत तहसील के गांवों में चकबंदी नहीं करने का बहाना कि भूमिधरों ने स्वैच्छिक चकबंदी योजना नहीं दी

12th पोस्ट….. 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से….. (गतांक 15 मार्च’ 2019 की 11th पोस्ट से आगे) इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें

मित्रों,

इधर अक्टूबर 2017 में बंदोबस्त अधिकारी, चकबंदी विभाग उधमसिंहनगर, रुद्रपुर के स्टाफ ने बताया कि उन्हें झलोड़ी गाँव में चकबंदी की वस्तुस्थिति की जानकारी लेने का आदेश हुवा है जिसमें उन्हें मेरा व्यक्तिगत सहयोग चाहिए. उन्होंने उक्त पत्र की प्रति मुझे दिखाई जो हमारे पत्र दि० 11 मई, 2017 के क्रम में आयुक्त एवं सचिव राजस्व परिषद उख० से उनको निर्देशित था. तदनुसार 14 नवम्बर को उक्त चकबंदी टीम को स्वैच्छिक एवं आंशिक चकबंदी को तैयार गाँव झलोड़ी एवं कारचूली (रानीखेत) की दोनों जमीनों का निरिक्षण भूमिधरों की उपस्थिति में कराया गया.

लेकिन, एक माँह तक भी जब उक्त निरिक्षण की रिपोर्ट भूमिधरों को नहीं मिली तो भूमिधरों ने आ० अजय भट्ट जी, प्रदेश अध्यक्ष भाजपा को दि० 27 दिसम्बर 2017 को खिरखेत प्राइमरी स्कूल के सताब्दी समारोह में एक ज्ञापन दिया लेकिन उस पर भी जब कोई कार्यवाही नहीं हुई तो भूमिधरों ने आ० करन महरा मा० विधायक एवं उप-नेता प्रतिपक्ष के द्वारा भी रिपोर्ट मांगी लेकिन आश्चर्य की बात है कि उनके पत्र का भी कोई जबाब नहीं मिलने पर 28-4-2018 को आयुक्त एवं सचिव राजस्व परिषद, उत्तराखंड से RTI द्वारा सूचना मांगने पर ज्ञात हुवा कि,

“ हमारे द्वारा यानि भूमिधरों द्वारा ग्रामसभा झलोड़ी में अभी स्वैच्छिक चकबंदी की योजना तैयार नहीं की गयी है ”.

वाह: रे हमारे उत्तराखंड के जनप्रतिनिधियों की सरकार तथा उनके विभाग ??? शायद इसी को कहते हैं “खोदा पहाड़ निकली चुहिया” !!!

2014 से तैयार भूमिधरों को ही यदि अपने गाँव की स्वैच्छिक चकबंदी योजना भी स्वयं बनानी थी तो फिर उत्तराखंड सरकार तथा उनका चकबंदी विभाग किसलिए है ? इनसे नहीं होता है तो स्पष्ट कहें…. लेकिन इन्होंने आजादी बाद के 70 सालों से इसी नीति में पहाड़ एवं यहाँ के स्थानीय निवासियों को तबाह कर दिया है…

अत: इन बुनियादी समस्याओं को अब यों ही छोड़ा नहीं जाना चाहिए…. अत: इस पर भी हम आगे चर्चा करेंगे. संलग्न पत्रों को क्रमवार 224 to 235 में देखें. क्रमश: ….

केवला नन्द “फ़कीर”

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