इसके लिए पहले भूमिबंदोबस्त एवं चकबंदी इन दोनों प्रक्रियाओं को ठीक से समझना होगा
भूमिबंदोबस्त वह प्रक्रिया है जिसमें परिवार बढने के साथ साथ कृषि-बागवानी की उपज भी बढाये जाने हेतु नये खेतों का निर्माण किया जाता है. तथा रिकार्ड रखने के लिए प्रत्येक परिवार के प्रत्येक खेत को एक एक नम्बर देकर उनके कुल खेतों को एक संयुक्त खाता के अंतर्गत लेकर इन खेतों का रिकार्ड राजस्व विभाग के पास सुरक्षित रहता है. इस खाते को गोलखाता के नाम से भी जाना जाता है जिसके अंतर्गत के प्रत्येक खेत में परिवार के सभी सदस्यों का सहखातेदारी के तौर पर बराबर का हिस्सा होता है.
उत्तराखंड के पहाड़ों में भी खेत बनाने हेतु हमारे पूर्वजों को कृषि-बागवानी-पशुपालन आदि के लिए जहां भी जल-जंगल-जमीन की सुविधा मिली उन्होंने पहाड़ काट काट कर सीढ़ीदार खेत बनाये और उनमें पोषक तत्वोंयुक्त मिटटी को भी संरक्षित किया ताकि फसलों की अच्छी पैदावारें हो.
जैसा रिकार्डों में उपलब्ध है, हमारे पहाड़ में अंग्रेजों के समय 11 भूमिबंदोबस्त हुवे. उन्होंने पहला भूमिबंदोबस्त 1815-16 में किया तथा अंतिम 11वां 1928 में हुवा. इसके बाद भारत सरकार द्वारा 12वां भूमिबंदोबस्त 1960-62 में हुवा. लेकिन इसके बाद पहाड़ में भूमिबंदोबस्त की इस प्रक्रिया को रोक कर नए खेत बनाने बंद कर दिए गये. जबकि राज्य के तराई-भाबर व अन्य मैदानी क्षेत्रों में यह प्रक्रिया निरंतर चल रही है… तो ये दोहरा माप-दंड, सिर्फ उत्तराखंड के पहाड़ के लिए ही क्यों? क्या यह भूमाफियाओं की कोई साजिस तो नहीं, जिसे जनता एवं सरकारों को भी समझना होगा.

पहाड़ में 1960-62 की भूमिबंदोबस्ती के रिकार्डों को देखने से प्रत्येक परिवार के पास तब लगभग 100 नाली कृषिभूमि थी जो इन बीते वर्षों में, यानि 2023-24 तक दो-तीन भूमिबंदोबस्त और हो जाने चाहिए थे जिससे गाँवों में प्रत्येक किसानों के पास आज कम से कम 60-70 नाली (एक नाली = 2000 वर्गफुट/ 1 एकड़ = 20 नाली/ 1 हे० = 50 नाली) भूमि होती तो निश्चित ही कृषिजन्य कार्यों के सहारे लोग गाँवों में रहते तो संयुक्त परिवार भी कायम रहते जिससे आवादी बढने से स्वास्थ चिकित्सा, शिक्षा, पशुपालन, मौनपालन आदि अनेक और उद्योग भी पनप रहे होते तो मूलनिवास-भूकानून-रोजगार जैसी अनेकों समस्याओं का भी स्वत: ही निदान हो रहा होता! किन्तु जैसा दिख रहा है, भूमिबन्दोबस्त रोककर नये खेत नहीं बनने से परिवारों के बढने के अनुपात में वही लगभग 100 नाली भूमि अब परिवार के प्रत्येक सदस्य के पास घटकर 2-4 नाली भी नही रह जाने से जहां उन्हें रोजगार की तलास में गाँवों से दूसरे राज्यों की ओर पलायन के लिए मजबूर कराके हजारों गांवों को जनविहीन होने दिया गया है वहीं पुनर्विकास के नाम पर करोड़ों/अरबों की योजनाओं को ठिकाने लगाते हुवे पूंजीपतियों को 12.5 एकड़+ यानि 250 नाली से भी अधिक भूमि एक साथ चकों में देने के लिए 2018 में इन्वेस्ट समिट के नाम से नया भूकानून भी लागू कर दिया… जो एक साजिस भरी मंसा भी हो सकती है कि पहाड़ के मूलनिवासी किसानों को इस भूमि से बंचित ही रखकर धीरे धीरे पूंजीपतियों की झोली में डाल दिया जाय तथा इसके रिकार्ड आगे 13वां भूमिबंदोबस्त के नाम से भी जाने जा सकते हैं
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