हमारी चुनी हुई सरकारें भावी पीढ़ियों को कहाँ पहुंचाएंगी.

Written by chakbandi

August 22, 2024

9th पोस्ट (पार्ट- I) ….1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…….. (गतांक 19-2-2019 की 8th पोस्ट से आगे)….इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें

मित्रों,

उत्तरखंड पर्वतीय क्षेत्र के ग्रामीण भूमिधरों को उनके पूर्वजों के विखरे खेतों की कुल भूमि अन्य पर्वतीय राज्यों की भाँती मूलभूत सुविधाओं के सांथ चकों में मिलनी चाहिए. इससे बंदरों, सुवरों आदि से फसलों की सुरक्षा आसान होने पर दीर्घकालीन रोजगारपरक व्यवसायिक खेती के आर्थिक लाभों को देख कर गाँवों से पलायन कर चुके लोग स्वत: वापस आने के लिए प्रेरित होंगे जिससे गाँवों में आवादी बढने पर शिक्षा, स्वास्थचिकित्सा, व्यवसाय, जल-जंगल-जमीन, गैर उत्तराखंडियों की घुस-पैठ, गैरसैण राजधानी जैसे अनेक मुद्दों में जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी भी स्वत: सुनिश्चित होगी !!!

लेकिन सरकार भूमिबंदोबस्ती-चकबंदी के इस अहम मुद्दे को 1985 से किसी ना किसी बहाने टालते आई है… इस सम्बन्ध का एक लम्बा पत्राचार 1985 से 2014 तक जो अरुणाचल प्रदेश प्रवास के दौरान चला, उसे इससे पहले की 8 पोस्टों में क्रमवार दिया गया है. इधर 2014 के बाद का पत्राचार भी आप सभी पहाड़ प्रेमी एवं चकबंदी शुभचिंतकों की जानकारी के लिए आगे की पोस्टों में भी क्रमवार दिया जाना है ताकि भूमि सम्बन्धी मुहिम मजबूत बन कर हमारी भावी पीढियों/बाल-बच्चों को उनके पूर्वजों के जल-जंगल-जमीनों आदि की सही जानकारी होकर खाते-खतौनियों में उनके विखरे खेतों की कृषिभूमि चकों में व्यवस्थित हो, जो भविष्य के लिए उनका एक स्थायी पता भी होगा !!! वर्ना, हम जमीन-जायदाद वालों को 1985 से चिल्लाने के बाद भी, जब वर्तमान में ही, स्लम्स में बंजारों का जैसा जीवन जीने को मजबूर किया जाने लगा है, तो कल्पना करके देखिये कि डिमोक्रेसी के नाम पर चुनी जा रही ये सरकारें हमारी भावी पीढ़ियों को कहाँ पहुंचाएंगी ??? (स्लम्स में रहते हैं पलायन करने वाले अधिकतर उत्तराखंडी… समाचार की कटिंग पृष्ट 184 भी देखें).

इसीलिए, हमारा स्पष्ट मानना है कि भूमिधरों की कुल भूमि जब तक उन्हें मूलभूत सुविधाओं के सांथ चकों में नहीं मिलेंगी तो बंदरों, सुवरों व बाघों का आतंक में कोई भी परिवार विखरे खेतों में कैसे खेती करेगा तथा किसके सहारे गांवों में रहेगा? पलायन का यही मुख्य कारण हैं; जिससे खेत बंजर, घर खंडर तथा हजारों गाँव भूतिया हो कर पहाड़ में शिक्षा-स्वास्थ-व्यवसाय आदि भी बर्बाद है… तो फिर ये तथाकथित जनप्रतिनिधियों की सरकार पलायन रोकने के नाम पर करोड़ों-अरबों की योजनायें व कमेटियाँ, समीतियाँ तथा आयोग के बजट को एक बार अपने ही भूमिधर वोटरों की पुस्तैनी भूमि को व्यवस्थित करने के लिए भी क्यों खर्च नहीं करना चाहते…???

अत: जो-जो गाँव चकबंदी के लिए तैयार हैं उनमें सरकार भूमिबंदोबस्ती-चकबंदी भू-प्रबंधन के सांथ मॉडल के तौर पर तुरंत कराए.कृपया, 2014 से 2016 तक का एक लम्बा पत्राचार जिसे संशिप्त रूप में 64 पृष्ठों के द्वारा वर्तमान सरकार के अस्तित्व में आते ही मार्च 2017 में मा० मुख्यमंत्री जी को दिया गया है. स्थानाभाव के कारण इस पोस्ट में मात्र 42 पत्रों को 120 to 161 में देखें तथा बांकी 22 पत्रों को 162 to 184 में इसी 9th पोस्ट के पार्ट-II में देखें :- क्रमश:

केवला नन्द “फ़कीर”

0 Comments

Submit a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

💬 How may I help you?
💬