6th post… 20 जनवरी’ 2019 (एक अनुरोध, कास्तकारों की 10 हे० की फल-पट्टी आदि हेतु) 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें
मित्रों,
यह पत्राचार जो मेरे अरुणाचल प्रदेश में नौकरी करते हुए उत्तर प्रदेश की सरकारों के सांथ चला तथा अभी सेवानिवृत होने के बाद अपनी उत्तराखंड की सरकारों के सांथ भी लगातार चलता ही आ रहा है, इसे क्रम वार यहाँ देने का प्रयास किया जा रहा है जो इस पर्वतीय क्षेत्र के प्रति जुम्मेदार लोगों की सम्बेद्नाओं को दर्शाते है… कृपया इस सम्बन्ध के किसी अन्य के पास भी अगर कोई पत्रादि हों तो उन्हें भी साझा करते हुए अपने सुझाव भी दें…
जैसा पूर्व पोस्टों से स्पष्ट है कि जहॉ ग्रामीणों के विखरे खेतों की पैदावार लागतें रु० 52/- प्रति किग्रा० बैठ रही हों, विभागाधिकारियों/कर्मचारियों द्वारा पहाड़ों के अनुकूल योजनाये बनाने की बात तो छोड़ ही दीजिये बल्कि “ महिलाओं की अपनी योजना “ में स्वीकृत धनराशि को भी ठिकाने लगाने की होड़ मची हो, ग्रामीणों की भावनाओं से खिलवाड़ हो रहा हो, गाँवों की विकट परिस्थितियों में जीवन यापन को लेकर जहॉ-तहॉ हाहाकार मचा हो तो स्वाभाविक है कि जागरूक लोग आखिर कब तक चुप रहेंगे? किस-किस का भरोसा करेंगे व किस-किस के आगे गिडगिडायेंगे? जबकि पहाड़ों के अनुकूल उनकी अपनी भी अनेक तकनीकिपूर्ण दिनचर्याऐं है जिन्हें सरकार के सहयोग से एक प्रोजेक्ट के रूप में उठाया जाना था वह भी भूमिधरों के पारिश्रमिक के बदले में सिर्फ आधी कीमत पर !!! किन्तु सरकार की कार्यप्रणाली से क्षुब्ध होकर कास्तकार महिलाओं ने 1993 में ‘‘ एक अनुरोध पत्र ‘‘ के द्वारा निर्णय लिया कि वे “ अपनी ही योजनानुसार “ स्वयं सीटू विधि द्वारा बगीचे तैयार करें.
देखते ही देखते 2-3 वर्षों में अनेक गाँवों में सीटू विधि से 10-10 हे० की फल-पट्टियों में लगभग 7000 पौंधे तैयार हो गये !!! जिनकी सूचना समय-समय पर शासन-प्रशासन को देते रहने के बाद भी कास्तकार महिलाओं को न तो इन पोंधों की कीमत दी गयी और न इन फल-पट्टियों की तकनीकी देख-रेख ही सुनिश्चित की गयी. 1997 में इस बाबद तत्कालीन ग्रामप्रधान द्वारा सत्यापित प्रार्थना पत्र को भी यों ही नजर अंदाज कर दिया गया जो हमारा दुर्भाग्य ही रहा कि 2001-02 तक हमारी इन सभी फल-पट्टियों की पौंधे कीड़े-विमारियों व तकनीकी देख-रेख के अभाव में धीरे-धीरे बर्वाद हो गई…
जबकि 1988-89 के अदेशोंनुसार चकबंदी के लिए खोले गये आफिसों के द्वारा इन गाँवों में भूमिबंदोबस्ती चकबंदी भी हो जानी चाहिए थी !!! इधर सरकार के चकबंदी आफिसों के भरोसे अल्मोड़ा व पौड़ी जिलों के अधिकतर भूमिधरों ने अपने आवाद खेत भी इस भरोसे से छोड़ दिए कि उन्हें अब जमीन चकों में मिल जायेगी… लेकिन, खेत बंजर व घर खंडर होते-होते लाखों कास्तकार मालिक से मजदूर बनने को विवस होकर गाँव छोड़ते चले गये …. जो आज भी बदस्तूर जारी है.
इस दुःख को हम किस सरकार के आगे रोयें ???
(एक अनुरोध, कास्तकारों की निजी पौंधों का बिवरण, 10 हे० की एक फल-पट्टी आदि संलग्न पत्र – 74 to 89 देखें) क्रमश: ….
केवला नन्द “फकीर

















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