5th post…14 जनवरी’ 2019 (विभागों की मनमानी व न्यायिक जांच के आदेश) 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें :
मित्रों,
इस सम्बन्ध के कुछ उपलब्ध पत्र-प्रपत्रों का एक लम्बा पत्राचर जो मेरे अरुणाचल प्रदेश में सेवारत रहते हुए 1985 से उत्तर प्रदेश की सरकारों के सांथ चला तथा अभी सेवानिवृत होने के बाद अपनी उत्तराखंड की सरकारों के सांथ भी लगातार चलता ही आ रहा है, इसे क्रम वार यहाँ देने का प्रयास किया जा रहा है जो इस पर्वतीय क्षेत्र के प्रति जुम्मेदार सरकारों की सम्बेद्नाओं को दर्शाते है… कृपया इस सम्बन्ध के यदि किसी अन्य के पास भी कोई पत्रादि हों तो उन्हें भी साझा करें तथा सभी शुभचिंतकों से भी आग्रह है कि वे भी अपने सुझाव दें ताकि सरकारों की गलत नीतियों के कारण भूमिधरों को मालिक से मजबूरी में मजदूर होने से रोकने के लिए न्यायालय में पहल की जा सके.
जैसा 4th पोस्ट से विदित है कि “कास्तकार महिलाओं की योजना” को क्रियान्वयन हेतु 17 हेक्टर यानि 850 नाली भूमि का एक टुकडा भूमि संरक्षण विभाग को दिया गया किन्तु देखते ही देखते योजना के नाम पर रुपयों को ठिकाने लगाने की मुहिम ऐसी तेज हुई कि कास्तकारों की भूमि दूर-दूर छोटे-छोटे टुकड़ों में विखरी होने के कारण अधिकारियों व कर्मचारियों ने मनमानी करके उक्त योजना की ऐसे-तैसी कर दी.
कास्तकारों की परिषद् एवं खेती का कार्य कर रही महिला मंडलों के साथ विचार-विमर्श किये बगैर ही, जैसा कि योजनानुसार सीटू विधि से स्वयं की बीजू पौंध उचित दूरी पर विधिवत तैयार गड्डों में उगाकर उन्हें बिना उखाड़े वहीं पर कलमी बनाकर पालने की कीमत कास्तकारों को ही दी जानी थी, ताकि वे योजना के दूसरे चरण पर काम करते लेकिन अधिकारियों ने योजना के विपरीत आपा-धापी में मैदानी क्षेत्रों की नर्सरियों से आम, नीबूं, अमरूद आदि की हजारों बीजू पौंधों को लाकर नैपाली मजदूरों द्वारा वहां की बलुई-दोमट मिटटी में बिना सिचाई व्यवस्था के जहां-तहां रोपण करा कर धनराशि का दुरूपयोग किया जाने लगा.
दूसरी ओर, कास्तकारों की 25-30 वर्ष पुरानी सींचाई व्यवस्था जो गर्मियों में गधेरे की पानी की क्षमतानुसार पतली गूल से हो रही थी उसकी थोड़ी-बहुत मरम्मत के बजाय उसे जड़ से ही उखाड़ कर, कास्तकारों के मना करने के बाबजूद भी, रुपयों को खपाने के लिए जबरदस्ती नहर रुपी नयी गूल का निर्माण करा दिया. इससे बरसात के भयंकर पानी से कास्तकारों के अनेक सीढ़ीदार खेत बह गये. खेतों में जहाँ-तहां कटाव व भूस्खलन से अनेक अप्रत्यासित नुकसान होगये. (पटवारी की रिपोर्ट देखें). इनसे कास्तकार महिलाओं की भावनाओं को बहुत बड़ी ठेस पहुंची क्योंकि वे ही इस योजना की मुख्य सूत्रधार थी और सरकार से बहुत बड़ी आशा लगाये हुए थी !!!
लेकिन, इसे देख कास्तकारों का रोष जब न्यायालय की शरण लेने को बाध्य होने लगा तो शासन द्वारा कार्य को बंद कराते हुए उक्त भूमि संरक्षण विभाग को पूरे पर्वतीय क्षेत्र में बैन कर दिया गया. इस प्रकरण का एक लम्बा पत्राचार मौजूद है जिसके कुछ ही पत्रों को यहाँ पर दिया जा रहा है. (भूमि संरक्षण विभाग की मनमानी, SDM, DM आदि को पत्र, समाचारों की कटिंग्स व न्यायिक जांच हेतु प्रार्थना आदि क्रमवार संलग्न- 42 to 73 देखें). क्रमश: …
केवला नन्द “फकीर”


































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