5 दिसम्बर’ 17 (योजना एवं धनराशि हेतु मा० मंत्रीजी को ज्ञापन) बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…. इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.
बागवानी/चकबंदी पर 1985 के बाद की फ़ाइल के पन्नों से…..देखें :-
2nd पोस्ट 5-12-2017
मित्रों,
जैसा आपने इसके पहले 17 नवम्बर की 1st पोस्ट में देखा कि हमारी परम्परागत खेती में रवि फसलों की पैदावार लागत सन 1985 में 52/- रूपये प्रति किग्रा० की दर तक बैठने के कारण हमने निदेशालय उद्यान से प्रार्थना कि थी कि वे हमारी ग्रामसभा की पूरी भूमि को समन्वित बागवानी योजना के तहत चकों में विकसित कराएँ ताकि कास्तकारों को उनकी पैदावारों से आर्थिक लाभ मिले. जिसके लिए 26 जुलाय 1988 को भेजे गये हमारे पत्र के प्रतिउत्तर में निदेशालय उद्यान से DHO को एवं DHO से ADO को जो पत्र भेजे थे उनकी फोटो भी आपने देखी हैं.
लेकिन खेद है कि निदेशालय में अनेक तकनीकि विशेषज्ञों के होते हुए भी उन्होंने कष्टमय कृषि कार्य कर रही ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक उत्थान के लिए कोई भी ठोस योजना नहीं दी. अंतत: बाध्य होकर भूमिधरों ने “ग्राम विकास परिषद्” नाम कि अपनी पंजीकृत संस्था के माध्यम से खुद योजना बनाई जिसे,
1a-d– ग्रामसभा की पूरी भूमि के लिए समन्वित बागवानी हेतु 2070210/- (बीस लाख सत्तर हजार दो सौ दस रुपयों) की 14 प्रष्ठों की एक योजना दि० 8 फरवरी 1989 में निदेशालय को सौंपी. जिसमें 1a से 1d तक मुख्य योजना व मोवाइल यूनिट का डिटेल मात्र यहाँ पर दिया जा रहा है. आवश्यक होने पर अन्यों का डिटेल भी दिया जाएगा.
2a-b– इसके क्रम में 8 फरवरी 89 को ही निदेशालय उद्यान द्वारा सहायक आयुक्त एवं संबंधितों को पत्र भेजे गए.
3- पुन: निदेशालय उद्यान के पत्र के क्रम में DHO अल्मोड़ा ने अपने पत्र दि० 6 अप्रेल 89 के द्वारा अध्यक्ष परिषद, मुझे एवं अन्यों को सलाह दी कि हम उक्त योजना के लिए किसी व्यवसायिक बैंक से लोन ले लें.
4a-b– इस पर 28 अप्रेल 89 के पत्र द्वारा स्पष्ट किया गया कि लोन लेकर भूमिधरों/कास्तकारों को दोहरी समस्याओं में उल्झाने के बजाय पर्वतीय क्षेत्र के विकास हेतु सरकारों द्वारा चलाई जा रही नाना प्रकार की योजनाओं के अंतर्गत किसी एक योजना के तहत इस क्षेत्र को भी उक्त योजनाबद्ध तरीकों से विकसित किया जाय.
5a-b– अध्यक्ष ग्राम विकास परिषद् द्वारा दि० 18 जून 89 को मा० मुख्य मन्त्री उत्तरप्रदेश को भी पत्र दिया गया कि राज्य अथवा केंद्र सरकार की ओर से इस योजना के लिए बजट दिलाया जाय.
6a-b– इधर क्षेत्रीय ग्रामप्रधानों, जनप्रतिनिधियों, गणमान्यों आदि ने भी उक्त योजनानुसार क्षेत्र की अन्य 15 ग्रामसभाओं में भी इस योजना को तुरंत लागू कराने हेतु तत्कालीन वरिष्ट उपाध्यक्ष, पर्वतीय विकास परिषद, उत्तरप्रदेश, श्रीमान गोविन्द सिंह महरा जी, कैम्प रानीखेत को भी 9 सितम्बर 89 को एक ज्ञापन दिया.
7a-d– इसके तुरंत बाद 5 दिसम्बर 89 को परिषद की बैठक में ग्रामसभा के प्रत्येक गाँव के लिए महिला मंडल कि अध्यक्षाओं का मनोनयन कर उनके द्वारा 14 दिसम्बर के पत्र से SDM रानीखेत को संबोधित करते हुए अध्यक्ष पर्वतीय विकास परिषद उ०प्र० एवं अन्य संबंधितों को भी आग्रह किया गया कि क्षेत्र को फल-पट्टी के रूप में विकसित किया जाय. कृपया इन सभी पत्रों की फोटो भी देखें. सम्बंधितों की प्रतिक्रियायें अगली पोस्ट पर….. धन्यवाद.
केवला नन्द “फ़कीर”
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