उत्तराखंड का पर्वतीय क्षेत्र मानवता के लिए एक बरदान है जिसे मैंने उत्तराखंड से बाहर रह कर समझा. 1974 में देश
के पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश के कृषि-उद्यान विभाग में नियुक्त हुवा. विभाग के आदेशोंनुसार वहां के लिए फल-
पौंधे तथा नर्सरियों के लिए माली, बागवानों के लिए मधुमक्खियों के बक्से आदि आदि हेतु उद्यान निदेशालय
चौबटिया, रानीखेत मेरा आना जाना लगातार चलता रहा. इसबीच, यहाँ के फल-पौधों से अरुणाचल के किसानों की
दिन प्रति दिन सुधरती आर्थिक स्थितियों के मुकाबले हमारे पहाड़ के किसान 52/- रूपये प्रति किग्रा० की दर तक
बैठने वाली कृषि फसलों को ही लेने को मजबूर हैं…? यद्यपि, जागरूक किसानों का एक समूह सितोष्ण पौधशालाओं
के लिए सक्रिय था किन्तु इसकी भी 1984 में सेव में स्कैव नामक की बिमारी ने कमर ही तोड़ दी…?
ऐसी बिडम्बनाओं को देखकर पहाड़ के किसानों के बिखरे खेतों को पहले चकबंदी की प्रक्रिया के द्वारा इकट्ठा कराने
की सोच बनी. यों भी चकबंदी देश के विभन्न राज्यों में 1920 से लागू है तथा हमारे पडौसी राज्य हिमाचल प्रदेश ने
भी 1971 में पंजाब से पृथक राज्य मिलते ही इस चकबंदी की प्रक्रिया को पहले अपनाया. इसी प्रक्रिया के द्वारा यहाँ,
पहाड़ के किसानों के बिखरे खेतों को भी इकट्ठा कराने की जो कोशीस की गई वह आज 40 वर्षों बाद भी जारी है.
यद्यपि मा० हाईकोर्ट से संबंधितों को नोटिस जाते ही सरकार ने 2020-21 से चकबंदी कराने के आदेश दे दिए हैं तथा
हमारी जनहित याचिका के क्रम में सरकार की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में भी यह स्वीकारा है कि
रानीखेत के झलोड़ी गाँव के स्वैच्छिक चकबंदी के प्रस्ताव को बोर्ड आफ रेवन्यू भेज दिया गया था किन्तु इसके बाद
भी इन बीते वर्षों में आगे कोई कार्यवाही नहीं होना चकबंदी की प्रक्रिया में आने वाले अवरोध प्राकृतिक कम साजिशों
से भरे ज्यादा होने से शासन-प्रशासन एवं अन्यों की मंशा पर भी प्रश्न चिन्ह लगाते हैं?
इस सम्बन्ध के कुछ मुख्य पत्र-तथ्य जो मेरे अरुणाचल प्रवास के दौरान हुवे उन्हें फेसबुक पर क्रमवार 14 पोस्टों
में दिया गया है. इन्हें पाठकों की सुविधा हेतु यहाँ भी Link के साथ कापी पेस्ट किया जा रहा है ताकि भविष्य में
फेसबुक से डिलेट होने की स्थिति में ये आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वेबसाइट पर सुरक्षित रहें.
केवला नन्द तेवाड़ी
चकबंदी मंच उत्तराखंड
मित्रो,
दैनिक जागरण 16 नम्बर, 2017 का समाचार शीर्षक “ कुमाऊं का चकबंदी गाँव बनेगा झलोड़ी ” उसमें 1985 से चले आ रहे
प्रयासों का जिक्र किया गया है जिससे तबकि फाइलों के पन्नों को देखने से लगता है कि “उत्तराखंड में चकबंदी आवश्यक क्यों?”
यह कल-परसों की कोई अचानक उपजी सोच नहीं है.
इस बारे में जल-जंगल जमीनों से जुड़े पौड़ी निवासी 81 वर्ष के बयोब्रद्ध आ० गणेश गरीब जी जैसे अनेक व्यक्तियों का मानना
है कि देश के अन्य पहाड़ी राज्यों की तरह सरकारों ने हमारे पूर्वजों के विखरे खेतों की कुल भूमि जिसकी जितनी है उतनी एक
सांथ चकों में अगर तभी दे दी होती तो निश्चय ही भूमिधर एक ही स्थान पर पूर्ण मनोयोग से कृषिजन्य कार्यों को अपनी
आर्थिकी का मुख्य श्रोत बनाकर अन्य बाहरी श्रोतों से होने वाली आय जैसे नौकरी-पेसा व सरकारी अनुदान आदि से गाँवों को
औद्योगिकरण की ओर लेजाते जिससे आज के यही गाँव शहरों में परिवर्तित हो रहे होते.
जबकि विकास के नाम पर सरकारी स्तरों से जो भी प्रयास हुए वे सब सोने के अन्डे देने वाली मुर्गी का हलाल करके रातों रात
मालामाल होने की होड़ में इस देव भूमि की आत्मा माने जाने वाले समृद्ध गाँवों को ही ऐसा लील गया कि आज हमारे हजारों
गाँव भूतिया गाँवों में तब्दील हो चुके हैं और हम खुद जमीन जायदाद वाले होकर भी खाना-बदोसों का जैसा जीवन जीने को
मजबूर हैं. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी आज इसकी पुष्टि करता है.
मित्रों, इस सम्बन्ध में ऐसा नहीं कि हम तब चुप थे, मेरा इन बीते 43 वर्षों (1974-2017) का व्यक्तिगत अनुभव आधारित कुछ
पत्राचार जो पुरानी फाइलों में पड़ा है, उसे यहाँ संक्षिप्त में देखिये कि :-
- मैं 1974 में अरुणाचल प्रदेश (तब लोग उसे नेफा के नाम से जानते थे) के कृषि-उद्यान विभाग में नियुक्त हुवा. वहां की
आबो-हवा व भौगोलिक परिस्थितियां हमारे उत्तराखंड जैसी ही होने के कारण वहाँ बागवानी विकास हेतु यहाँ चौबटिया, रानीखेत
तथा हिमाचल व जम्मू-कश्मीर से प्रति वर्ष लाखों फल-पौंधों को लेजाकर वहां की हजारों हेक्टर भूमि में नाना प्रकार के फलों की
पट्टियाँ तथा अनेकों पौधशालायें तैयार की गयी. वहां पर आज ठन्डे इलाकों में सेव व अखरोट ने अच्छी पकड़ बना ली है तथा
कीवी फल की पैदावार विदेशी आयात को टक्कर देने की स्थिति में आ रही है. निचले इलाकों में संतरा, अन्नानास ने अच्छी
पकड़ बनाई है तथा बड़ी इलायची 600/- 700/- रु० किलो के हिसाब से व्यापारी खेतों से पैदावार उठाकर सीधे अरब की बाजारों में
निर्यात कर रहे हैं. इसे अगर ठीक से समझा जाय तो 2014 तक, अकेले बागवानी से 25-30 से 60-70 लाख रु० तक प्रतिवर्ष की
आय लेने वाले अनेक किसान अरुणाचल में मौजूद हैं. बड़ी इलायची को बढ़ावा देने में सिक्किम राज्य का काफी योगदान है.
कुल मिलाकर बागवानी विकास उस क्षेत्र में आम जन-समुदाय की आर्थिकी का केंद्र बनता जा रहा है. - जबकि यहाँ हमारे उत्तराखंड में भारत की आजादी (1947) के तुरंत बाद से ही उ०प्र० के इस पर्वतीय क्षेत्र (उत्तराखण्ड) की आबो-
हवा में बागवानी विकास की अपार सम्भावनाओं को ध्यान में रख कर उद्यान एवं फल संस्करण के सांथ-सांथ अनुसंधान हेतु
भी चौबटिया (रानीखेत) में निदेशालय उद्यान की स्थापना की गई थी. लेकिन यह आश्चर्य ही है कि चकबंदी के अभाव में हमारे
कास्तकार अपने दूर-दूर विखरे खेतों में हल-बैल लेकर जुताई,
बुवाई, देख-रेख हेतु आने-जाने में समय, श्रम व मजदूरी देकर 1985 में भी 52/- रूपये प्रति किग्रा० की दर तक बैठने वाली
परम्परागत कृषि पैदावारें ही लेने को बाध्य थे. जो आज की परिस्थितियों में सैकड़ों रूपये प्रति किग्रा० हो गयी होंगी. हमने इन
आकड़ों के आधार पर तभी 1985 में उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप व्यवसायिक सहकारी कृषि-बागवानी को चकबंदी के तौर पर
देश के अन्य पहाड़ी राज्यों की भाँती तत्कालीन उत्तर प्रदेश के इस पर्वतीय क्षेत्र में भी अपनाने की पुरजोर पहल की जो आज
2017 में भी जारी है.
इस सम्बन्ध में 1985 से ही निदेशालय उद्यान एवं संबंधितों को मेरे द्वारा अरुणाचल प्रदेश से लिखे गए पत्रों में से कुछों को
सिलसिलेवार यहाँ दिया जा रहा है जिनमें दि० 26 जुलाय 1988 के पत्र के प्रतिउत्तर में निदेशालय उद्यान से DHO को एवं DHO
से ADO को पत्रों की फोटो भी देखें. सम्बंधितों की प्रतिक्रियायें अगली पोस्ट पर….. धन्यवाद.
केवल नन्द “फकीर”
7351026532






0 Comments