चकबंदी क्या है ?

Written by chakbandi

February 21, 2024

 

 

 

अब बात करते हैं चकबंदी की

   चकबंदी क्यों और कैसे?:- जैसा कि पहले बताया गया है, 1960-62 तक 12 भूमिबंदोबस्तों के दौरान हमारे बुजुर्गों ने अपने अपने परिवार के लिए छोटे-बड़े आकार के जो सैकड़ों खेत बनाये वे जहां तहां दूर दूर होने से उनमें बैलों अथवा मशीनों से जुताई, बुवाई व फसलों की जंगली जानवरों से सुरक्षा एवं देख-रेख आदि की समस्याओं को कम करते हुवे व्यवस्थित तरीकों से आधुनिक कृषि-बागवानी-पशुपालन आदि की पैदावारों को बढाने के उद्देश्य से सरकारों द्वारा किसानों को उनके जहां तहां बिखरे इन खेतों की कुल भूमि एक-दो स्थानों पर बिना कोई फ़ीस लिए इकट्ठी देने की प्रक्रिया को “चकबंदी” कहते हैं. यह दो प्रकार की होती है—अनिवार्य एवं एच्छिक/स्वैच्छिक.इस प्रक्रिया के तहत प्रत्येक खेत गोलखाते की सहखातेदारी से निकलकर आगे के लिए प्रत्येक चकस्वामी के व्यक्तिगत नाम पर भी रिकार्ड में दर्ज हो जाता है. इससे किसान को अपने व्यक्तिगत चक के अंदर बड़े उद्यम करने के लिए व्यवसायिक बेंकों से ऋण आदि लेने हेतु किसी से निरापत्ति प्रमाण पत्र आदि लेने की बाध्यता भी समाप्त हो जाती है. 

  हमारे देश में यह चकबंदी 1920 से लागू है. यही हमारा पडौसी राज्य हिमाचल प्रदेश ने 1971 में पंजाब से पृथक राज्य मिलते ही सबसे पहले अपने भूमिधरों के लिए यह चकबंदी लागू की जिसके चलते हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था उद्यान आधारित है. लेकिन हमारे पहाड़ में यह चकबंदी भी आज तक लागू नहीं हो पाई है?

  इस सम्बन्ध में कहना है कि 1960-62 के बाद भूमिबन्दोंबस्त रोकना, कुजा एक्ट भी लागू कराना, इस सीमित कृषिभूमि को गोलखातों में दूर दूर खेतों में बिखरे रहने देना, बंदरों-सुवरों-बाघों आदि हिंसक जानवरों को बढाना, चकबंदी एक्ट पास होते हुए भी उसे लागू नहीं कराना, करोड़ों हेक्टर कृषिभूमि को बंजड होने देना आदि आदि से लगता है किसी बहुत बड़ी साजिस के तहत ये सब हो रहा है. जबकि, 1985 में ही हमने तत्कालीन उत्तर प्रदेश शासन को पहाड़ के इन दूर दूर बिखरे सीढ़ीदार खेतों में फसलों की पैदावार लागतें तब 52/- रूपये प्रति किग्रा० तक बैठने के आंकड़े प्रस्तुत किये हैं.

 

 

 दूर दूर बिखरे सीढ़ीदार खेतों में हलिया-हल-बैल लेकर या मशीनों से जुताई-बुवाई-निराई व समय समय की देख-रेख के चलते पैदावार लागतों को देखकर मामले ने जब काफी तूल पकड़ा तो उत्तर प्रदेश शासन द्वारा 1991 में कुमाऊं मंडल के लिए अल्मोड़ा में तथा गढवाल मंडल के लिए पौड़ी में, दो चकबंदी आफिस भी खोले गये. 1996 में इन आफिसों की प्रोग्रेस मांगी तो पता चला कि पहाड़ के लिए अलग “चकबंदी एक्ट” होना होगा. जिसके लिए डा० आर.एस. टोलिया जी की अध्यक्षता में पहली चकबंदी समिति बनाई गई तथा 2000 में पृथक राज्य उत्तराखंड बनने के बाद भी उक्त “चकबंदी एक्ट” के लिए समीतियों के उपर समीतियाँ बनती रही जबकि अनेकों गाँव स्वैच्छिक चकबंदी हेतु भी तैयार हो गये थे. इस पर भी शासन द्वारा बताया गया कि चकबंदी के लिए 250 गाँवों का चयन किया जा चुका है… लेकिन सूचना का अधिकार द्वारा पूछने पर ज्ञात हुवा कि चकबंदी के नाम पर कहीं 8-9 लाख रुपयों की घेर-बाड़ की योजना दी गई है तो कहीं कहीं के लगभग 200 ग्रामाप्रधानों से लिखवा लिया गया कि वे चकबंदी नहीं करेंगे और जबरदस्ती चकबंदी कराई गई तो वे बिरोध भी करेंगे…

इन स्थितियों को देखकर कि 1996 से पहाड़ के लिए चकबंदी एक्ट बनाये जाने हेतु सरकारों द्वारा अनेकों समितियां/कमेटियां बनती चली गई लेकिन इन बीते 20 वर्षों में न तो चकबंदी एक्ट बना न इसकी नियमावली, तो, जमीनी स्तर पर कार्य कब होगा? अंतत: 2015-16 में रानीखेत तहसील की ग्रामसभा झलोड़ी के भूमिधरों द्वारा निर्णय लिया गया कि उनकी ग्रामसभा को उन्हीं के द्वारा सुझाए गये 8 (आठ) बिन्दुओं की नियमावलीनुसार पहले एक “चकबंदी मॉडल” के रूप में विकसित कराया जाय.

 

 

ग्रामसभा झलोड़ी के भूमिधरों द्वारा लिए गये इन निर्णयों का पहाड़ के सभी चकबंदी शुभचिंतकों ने भी जून 2016 में कोटद्वार की बैठक में इसका पूर्ण समर्थन करते हुए मा० मुख्यमंत्री उत्तराखंड को प्रार्थना की गई. इसके क्रम में “विधानसभा सत्र जुलाय 2016” के द्वारा उत्तराखंड पर्वतीय क्षेत्र जोत चकबंदी एवं भूमि व्यवस्था विधेयक 2016 के नाम से चकबंदी एक्ट पास होते ही झलोड़ी ग्रामसभा में “स्वैच्छिक चकबंदी मॉडल” के साथ साथ ग्रामसभा कारचूली में भी “आंशिक चकबंदी मॉडल” हेतु जिलाधिकारी अल्मोड़ा एवं भूमिबंदोबस्त अधिकारी रुद्रपुर की टीमों ने अपने निरिक्षण भी किये. भूमि बंदोबस्त अधिकारी रुद्रपुर की टीम को उनके निरिक्षण के दौरान “ चकबंदी मॉडल झलोड़ी “ का मास्टरप्लान समझाते हुए भी देखें…

किन्तु कुछ समय बाद पता चला कि इन गाँवों को दरकिनार करके गढवाल मंडल में माननीयों के गांवों को चकबंदी हेतु नोटिफाई कर लिया गया है, लेकिन आज तक वहां भी कुछ नही हुवा. अर्थात यह सोचने वाली बात है कि इतना सब होने के बाबजूद भी न तो सरकार ने 1960-62 से बंद भूमिबंदोबस्त को खोला और न किसानों को उनकी दूर दूर बिखरे खेतों की कृषिभूमि एक-दो स्थानों पर चकों में देने के लिए कोई कदम उठाया, जबकि इस बीच दर्जनों गाँव स्वैच्छिक चकबंदी के लिए तैयार हो गये.

इधर, यह पूछे जाने पर कि स्वैच्छिक चकबंदी के लिए वर्षों से तैयार गांवों का शासनादेशों के तहत विभागों द्वारा निरिक्षण होने के बाबजूद भी इन्हें क्यों दरकिनार किया गया? तो बताया गया कि रानीखेत तहसील अंतर्गत “ स्वैच्छिक चकबंदी चाहने वाले ग्रामीणों ने योजना भी बनाकर देनी चाहिए थी जो नहीं दी गई “. किन्तु वही, गढ़वाल मंडल में नेताओं के गांवों को चकबंदी के लिए नोटिफाई भी करने से पहले क्या उन गांवों के ग्रामीणों ने भी योजना दी थी? इसकी सूचना RTI द्वारा मांगने पर ज्ञात हुवा कि “ वहां के ग्रामीणों से कोई भी योजना नहीं ली गई “. तो एक राज्य में ये दोहरे नियम/प्रावधान क्यों?   

इससे स्पष्ट होता है कि शासन-प्रशासन में घुसे भूमाफियाओं को जब यह भान हो गया कि पहाड़ में चकबंदी होते ही अधिकांस किसान जिनकी 1960-62 के बाद भूमिबंदोबस्त नहीं होने व परिवार बढ़ते जाने के कारण 2-4 नाली कृषिभूमि भी नहीं रह गई है, वे जो, कृषिजन्य उद्योगों में रूचि रखते हैं, इस चकबंदी के बाद अपनी अपनी कृषिभूमि तुरंत बढाने के लिए अपने गाँवों के आजू बाजू की बेनाप भूमि को भी आवाद करेंगे जो उनका “मूलनिवास अधिकार” भी है. तो ऐसे में पूंजीपति भूमाफियाओं द्वारा इन्वेस्टमेंट समिट के बहाने पहाड़ के बड़े बड़े भूखंडों को पहले ही कब्ज़ाने हेतु 12.5 एकड़+ यानि 250 नाली से भी ज्यादा (अनलिमिटेड) जमीन के बड़े बड़े अपने अपने चक बनाये जाने हेतु आनन फानन में 6 अक्टूबर 2018 को नया भू क़ानून पास कर दिया गया. जबकि चकबंदी हो जाने से बड़ी बड़ी कृषिभूमि वाले अनेकों मूलनिवासियों को भी स्थानीय संसाधनोंनुसार प्रोजेक्टों की स्थापना में इन्वेस्ट करने का मौका मिला होता अथवा उन्हें भी प्रोजेक्टों में सहभागिता निभाने का मौका दिया जाना चाहिए था. इसीलिए भू कानून के हल्ले ने सरकार को अपनी इस एकतरफा नीति पर पुन: सोचने को मजबूर किया है तथा लोगों से उनके विचार भी मांगे हैं.

 

 

 

 

 

 

 

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